अनिल तिवारी, मुंबई
आज जनता और नई पीढ़ी के मन में एक जाति विशेष के प्रति अप्राकृतिक घृणा पैदा करने का सतत प्रयास हो रहा है और दुर्भाग्य यह कि ये काम शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से ही हो रहा है। जिन संस्थानों पर सामाजिक समरसता, संतुलित दृष्टि और सद्भाव सिखाने की जिम्मेदारी है, वही समाज में दरार पैदा करने लगे हैं। ऐसे में यह केवल एक समुदाय विशेष का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्र की सामाजिक चेतना पर हमला बन जाता है। वाराणसी बीएचयू का ताजा मामला इसी प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण है।
‘जीरो टॉलरेंस’ की हकीकत
दरअसल, बीएचयू में एमए-इतिहास प्रश्नपत्र में एक प्रश्न पूछा गया, ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि किस प्रकार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली?’ मुद्दा यह नहीं कि जाति विशेष की पितृसत्ता पर प्रश्न क्यों पूछा गया, बल्कि यह है कि प्रश्न की भाषा पहले से ही एक पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करती है। प्रश्न सहमति-असहमति, तर्क-वितर्क या आलोचनात्मक समीक्षा नहीं मांगता, बल्कि मानो निष्कर्ष पहले से तय करके विद्यार्थी से उसकी पुष्टि चाहता है।
हर समाज में कुछ अच्छे और कुछ बुरे लोग होते हैं। किसी कालखंड में ब्राह्मण समाज में भी कुछ अपवाद रहे होंगे, लेकिन उन अपवादों को आधार बनाकर पूरे समाज को दोषी ठहराना, नई पीढ़ी के मन में घृणा बोना और इतिहास को वैचारिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है। राष्ट्रद्रोह ही है। शिक्षा विभाग के जहरीले जहन से यह द्वेष बार-बार क्यों उपजता है? सरकार को यह जरूर जानना चाहिए। इससे पहले भी यूपी पुलिस एसआई भर्ती परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द का अपमानजनक प्रयोग हुआ था। तब सरकार ने इसे ‘अस्वीकार्य’ बताते हुए कार्रवाई की बात कही थी। फिर भी एनसीईआरटी, कक्षा ८ की इतिहास पुस्तिका में लिखा गया कि ब्राह्मणों ने ब्रिटिश शासक ‘ब्रिटानिया’ को शास्त्र सौंपे और मानो भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अंग्रेजों को आमंत्रित किया। जब योगी सरकार सामाजिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है, तो शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा संस्थानों और पाठ्य सामग्री में बार-बार ऐसी भाषा कैसे चली आती है?
सुनियोजित अभियान!
एक वेब सीरीज का शीर्षक दिया जाता है ‘घूसखोर पंडित’। फिर जातिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश। यदि भ्रष्टाचार दिखाना उद्देश्य होता तो वह किसी पात्र, पद या व्यवस्था के माध्यम से भी दिखाया जा सकता था, लेकिन बार-बार जाति विशेष के संदर्भों को नकारात्मक रूप में पेश करना निश्चित तौर पर किसी शैतानी दिमाग की उपज है। जब सरकार किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करने या सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वालों पर कठोर कार्रवाई की बात करती है, तो वो कार्रवाई जमीन पर नजर क्यों नहीं आती? उस पर विडंबना यह है कि एक तरफ नेता कहते हैं कि भाजपा जाति की राजनीति नहीं करती, दूसरी तरफ यह धारणा मजबूत करती है कि सामान्य वर्ग, विशेषकर ब्राह्मण समुदाय को अपमानित किया जाता रहेगा। यदि यह भावना बढ़ती गई तो देश-प्रदेश के राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। यूपी में ब्राह्मण विधायकों की बैठक, भाजपा नेताओं के बयान, पी.एन. पाठक जैसे विधायकों की ब्राह्मण भूमिका पर टिप्पणी संकेत है कि २०२७ में सरकार को खामियाजा भुगतना पड़ेगा। यह सर्वविदित है कि ये वही भाजपा है, जिसके साथ हमेशा ब्राह्मण खड़े रहे हैं। खुद सत्ताधारियों के अनुसार ‘सनातन परंपरा में ब्राह्मण को समाज का मार्गदर्शक, विचारक और संतुलनकर्ता माना गया है। जहां ब्राह्मण एकत्र होता है, वहां ज्ञान, विवेक और चिंतन का मंथन होता है, जो हिंदू अस्मिता को सशक्त बनाता है। उसका धर्म समाज को जोड़ना है, विभाजन नहीं।’ लगातार उन्हें बदनाम किया जा रहा है, जिसने अपने ज्ञान, तप, त्याग और मार्गदर्शन से समाज को दिशा दी। जिसने राजा को राजधर्म का पाठ पढ़ाया, निर्धन को न्याय का रास्ता दिखाया और सत्ता को नैतिकता की मर्यादा समझाई। यह वही समाज है जिसने स्वयं कुटिया में रहकर भी समाज के वंचितों, पीड़ितों और उपेक्षितों के लिए अधिकार, न्याय और सम्मान की बात की। इस परंपरा का मूल स्वभाव सत्ता-भोग नहीं, बल्कि ज्ञान, संयम, तप और लोककल्याण रहा है।
आज प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था में बैठे कुछ कलुषित मानसिकता के लोग लगातार एक सुनियोजित अभियान चलाते दिखाई दे रहे हैं। बार-बार विवाद, आपत्ति और जनाक्रोश के बावजूद ऐसी प्रवृत्तियों में कोई कमी नहीं आ रही। यह स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए है, क्योंकि सत्ता ऐसी जहरीली मानसिकता के सामने मूकदर्शक बनी दिखाई देती है। इससे समाज में जातीय विष पैâलाने वालों को मानो अलिखित छूट मिल गई है। देश में जातिगत जहर इस कदर घोला जा रहा है कि खुद इलाहाबाद हाई कोर्ट तक को जातीय रैलियों और जातीय महिमामंडन पर गंभीर रुख अपनाना पड़ा है। जिस तरह जातीय रैलियां समाज को बांटती हैं, उसी तरह शिक्षा और परीक्षा के नाम पर जातीय पूर्वाग्रह फैलाने वाली भाषा भी करती है।
शिक्षा व्यवस्था की साजिश!
मामला केवल समाज विशेष तक सीमित नहीं है। यह हर उस जाति, वर्ग और समुदाय का प्रश्न है, जिसके विरुद्ध किसी तय एजेंडे के तहत बदनाम करने की मुहिम चलाई जाती है। कभी शिक्षा सामग्री के माध्यम से सामाजिक सौहार्द पर प्रहार होता है, कभी न्यायपालिका पर, तो कभी किसी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान पर। किसी पर पितृसत्तात्मक सोच थोपने वाले शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारी स्वयं अपनी समाज-विरोधी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। अगर प्रश्नपत्र, पाठ्यपुस्तक और सांस्कृतिक सामग्री ही जातीय कटुता का स्रोत बनने लगें, तो फिर सामाजिक सद्भाव की सारी बातें खोखली साबित होंगी। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में चयनात्मक नहीं, समान रूप से कठोर और पारदर्शी कार्रवाई करे। वरना यह धारणा और मजबूत होगी कि सत्ता में बैठे लोग मंच से जाति-मुक्त राजनीति की बात करते हैं, लेकिन जमीन पर जातीय जहर फैलाने वालों को खुली छूट मिलती है। यदि किसी वेब सीरीज, पोस्टर या सार्वजनिक बयान पर धार्मिक-जातीय भावना आहत होने के आधार पर इस सरकार की ओर से कार्रवाई होती, तो निश्चित ही परीक्षा और पाठ्यपुस्तकों की भाषा पर वह संवेदनशीलता नजर आती। परंतु ऐसा नहीं हो रहा। जिससे यह प्रश्न अकादमिक बहस से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विचार का विषय बन गया है।
इतिहास पढ़ाया जाना चाहिए, पितृसत्ता पर चर्चा भी होनी चाहिए, सामाजिक अन्याय पर सवाल भी उठने चाहिए, लेकिन किसी एक जाति को स्थायी अपराधी बनाकर नहीं। अकादमिक स्वतंत्रता का अर्थ वैचारिक पक्षपात थोपना नहीं हो सकता। जिस दौर में दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, नवाचार और विकास की नई ऊंचाइयों को छूने का प्रयास कर रही है, उस दौर में हमारे यहां प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था में बैठे कुछ जातिवादी राजनीतिक पिट्ठू समाज में जहर घोलने में लगे हैं। उनका उद्देश्य ज्ञान नहीं, वैमनस्य है; सुधार नहीं, विभाजन है। ऐसे लोगों की पहचान कर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। शिक्षा व्यवस्था को वैचारिक प्रदूषण से मुक्त करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते इस जहरीली प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगी, तो इसके गंभीर सामाजिक और राजनीतिक परिणाम सामने आ सकते हैं। यदि शिक्षा विभाग ही समाज में दूरी और द्वेष पैदा करने लगे तो यह किसी बड़ी साजिश की पहली कड़ी मानी जानी चाहिए।
