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संपादकीय: आत्मचिंतन

जनता के सवालों के लिए लड़ना है, इसी उद्देश्य से राजनीति में आनेवालों को अब सिर्फ निराशा ही हाथ लगे, ऐसा माहौल आज बना दिया गया है। हर किसी को सत्ता की छांव तले ही समाजसेवा करनी है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर यह नौबत आज के मोदी-छाप हुक्मरानों ने ला दी है। अगर मोदी पचास साल पहले सत्ता में होते, तो बाबा आमटे, शिवाजीराव पटवर्धन, अभय बंग, पोपटराव पवार, प्रकाश आमटे जैसे दिग्गजों के समाजकार्य का रथ आगे ही नहीं बढ़ पाता। इन सबको साफ चेता दिया गया होता कि भाजपा की चौखट पर आओगे, तभी सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा, तभी विकास फंड नसीब होगा। मधू दंडवते, बैरिस्टर नाथ पई, मधू लिमये, पीलू मोदी, जॉर्ज फर्नांडिस, कॉमरेड हिरेन मुखर्जी और महाराष्ट्र के गणपतराव देशमुख, प्रो. एन. डी. पाटील जैसे नीतिवान जनप्रतिनिधियों को भी भाजपा की शरण में आने के लिए मजबूर कर दिया गया होता। भाजपा और उसके बिना वजूद वाले सहयोगी दल जिस तरह से दलबदल कराकर यह अट्टहास बिखेर रहे हैं, वह बेहद विकृत और घिनौना है। भाजपा के इस दौर में राजनीति का संतोष और सुकून पूरी तरह गायब हो चुका है। विपक्ष में सालों-साल काम करनेवाले विधायक और सांसद भी अपनी भूमिका में संतुष्ट थे। लोकतंत्र में विपक्ष का बचे रहना बेहद जरूरी है। विपक्ष मजबूत होगा तो सत्ताधारियों के सिर पर अहंकार का घमंड नहीं चढ़ेगा, ऐसे विचारों वाले शासक महाराष्ट्र में हुआ करते थे। विपक्षी बेंचों पर बैठनेवाले विधायकों और सांसदों के मतदाताओं के साथ पहले के शासकों ने कभी अन्याय नहीं किया। इसी वजह से महाराष्ट्र में एक अखंड संतोष का दौर जारी था। लेकिन अब मंजर बदल चुका है। आज महाराष्ट्र और देश में कोई भी संतुष्ट नहीं है। एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनना है तो देवेंद्र फडणवीस को अपनी कुर्सी बचानी है। दोनों ही
असंतुष्ट
हैं। शिंदे ने विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों को तोड़कर दिल्ली में बैठे ‘महाराष्ट्र-द्रोहियों’ को खुश करने का बीड़ा उठा रखा है। यह सच है, लेकिन जैसा कि राज ठाकरे कहते हैं, जब कुछ लोग खुद का सौदा करने के लिए तैयार बैठे हों तो खरीददार तो उनके दरवाजे तक पहुंचेगा ही। विधायक और सांसद बनने के बाद भी कुछ लोग तृप्त नहीं हैं। इसी असमाधान से असंतोष बढ़ता है और असंतोष से अति महत्वाकांक्षा का विस्फोट होता है। सत्ता, पद और पैसे के लिए सिर्फ अंधी दौड़ मची हुई है। हद तो यह है कि यह सब मिलने के बाद भी इन्हें चैन नहीं है। एक मिला नहीं कि दूसरे की हवस जाग उठती है। एक पार्टी छोड़ते हैं, दूसरी पकड़ते हैं। राजनीति की इस मेंढक-कूद का कोई अंत नहीं है। इधर से उधर और उधर से इधर कूदफांद मचाकर भी इनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। दूसरी तरफ, अनगिनत कार्यकर्ता किसी एक पार्टी में अपनी पूरी जिंदगी खपा देते हैं। सड़कों पर आंदोलन करते हैं, लाठियां खाते हैं, जेलों में सड़ते हैं। कुछ तो गोलियां तक खा जाते हैं। फिर भी इनमें से कई लोगों के नसीब में कोई राजनीतिक या सत्ता का पद नहीं आता। इसके विपरीत, कुछ लोगों को बिना किसी मेहनत के विधायकी, सांसदी और मंत्री पद की लॉटरी लग जाती है, फिर भी वे असंतुष्ट ही रहते हैं और आखिर में, गद्दारी करके इस दलदल से ‘टर्र-टर्र’ करते हुए दूसरे दलदल में छलांग लगा देते हैं। शिवसेना के छह सांसद और कल ही एक विधान परिषद सदस्य, इसी ‘असंतोष’ की मानसिक स्थिति में ‘मिंधे’ के कदमों में जा गिरे। सारे सुख और पद भोगने के बाद ये चले गए। बहाना क्या बनाते हैं, राजनैतिक मजबूरी। खाक मजबूरी! यह क्यों नहीं कहते कि सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए साष्टांग दंडवत किया है और अपनी ही मां से गद्दारी की है? सत्ता के नशे में चूर इन लोगों को एक अलग ही मस्ती चढ़ गई है। नैतिकता या वैचारिक मतभेदों के नाम पर साथ छोड़ना या नया घर बसाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल ही में जो दलबदल हुआ है, उसमें कौन-सी
नैतिकता या वैचारिक मतभिन्नता
है, जरा यह बात आपको वोट देनेवाले मतदाता राजा को भी तो पता चले! आप चुनकर तो आए शिवसेना की मशाल के निशान पर और अपने निजी स्वार्थ के लिए जा पहुंचे मिंधों के जनानखाने में! और सुनिए, क्या उस जनानखाने में आपको कोई इज्जत-आबरू मिल रही है? बिल्कुल नहीं। वहां तो दिल्ली के आकाओं के गुलाम, टहलुए और उनके ‘खोजा’ बनकर ही जिंदगी काटनी पड़ेगी। कोई महाशय तो उपसभापति पद के लालच में उसी जनानखाने में शामिल हो गए। इन लोगों ने अब तक कितने जनानखाने बदले हैं, इसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। जनानखाने की चाकरी बजाना ही अब कुछ लोगों की ‘राजनैतिक मजबूरी’ बन चुकी है। न देश की फिक्र है, न महाराष्ट्र के स्वाभिमान की परवाह। जो ज्यादा दाम देगा, उसी की सेज पर सज जाना है। यह जनानखानी और बावनखनी घटिया राजनीति आज महाराष्ट्र की पावन मिट्टी पर सरेआम और बेखौफ चल रही है। केंद्र और राज्य के सत्ताधारियों की वजह से महाराष्ट्र की जो शांत और संतोषी वृत्ति थी, वह पूरी तरह तबाह हो चुकी है। चारों तरफ सिर्फ नंगा नाच चल रहा है। किसी को पचास करोड़ में बिव्ाâना है तो किसी को उपसभापति पद के लालच में अपनी गैरत का सौदा करने बैठा दिया गया है। किसी को जनानखाने की चाकरी के इनाम के तौर पर केंद्र में मंत्री पद चाहिए। ऐसे लाचार और मानसिक रूप से खोखले लोगों को तोड़ना या खरीदना बेहद आसान काम है, इसमें कोई बहादुरी या शौर्य नहीं है। इसलिए इन जमातों की जीत का यह अट्टहास दुर्योधन का अट्टहास है। भरे दरबार में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब दुर्योधन और उसकी मंडली भी इसी तरह अट्टहास कर रही थी, लेकिन तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्होंने द्रौपदी की लाज बचाई। इसके बाद जो महाभारत हुआ, उसमें दुर्योधन और उसकी टोली का अट्टहास हमेशा के लिए खाक में मिल गया। आज राजनीति में जो यह अट्टहास गूंज रहा है, सभी के लिए आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए।

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