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संपादकीय : देश की वर्तमान स्थिति

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा एक बड़ा खुलासा करने का दावा किया गया है। एक साल पहले कश्मीर घाटी के पहलगाम में एक आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें २६ हिंदू पर्यटक मारे गए थे। हमलावर हवा की तरह तेजी से आए, हिंदू पर्यटकों की हत्या की और रफूचक्कर हो गए। इस हमले में शामिल आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गए, ऐसा बार-बार कहा जा रहा है; लेकिन यह बात सच नहीं लगती। अब जो नया खुलासा हुआ है, वह यह है कि पहलगाम हमले में इस्तेमाल किए गए मोबाइल चीन से पाकिस्तान के रास्ते आतंकवादियों तक पहुंचे थे। एजेंसी का कहना है कि ये फोन कराची-लाहौर के रास्ते आए थे। इन मोबाइल गैजेट्स में बैसरन इलाके की लोकेशन और कुछ महत्वपूर्ण स्क्रीनशॉट्स पाए गए हैं। यह तो जांच का एक हिस्सा हुआ, जिसके मुताबिक मोबाइल चीन से आए और आतंकवादियों ने उनका इस्तेमाल किया। लेकिन सवाल यह है कि भारत में आज भी ५० से ६० प्रतिशत डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक सामान चीन से ही आ रहे हैं, जिनमें मोबाइल फोन भी शामिल हैं। तो फिर गलवान हमले और पहलगाम हमले के बाद भी भारत ने चीन के साथ अपना व्यापार बंद क्यों नहीं किया? चीन अगर पाकिस्तान के आतंकवाद को अपनी जमीन पर पाल-पोस रहा है और उस आतंकवाद से भारत को खतरा है, तो चीनी अर्थव्यवस्था पर चोट करना भारत का कर्तव्य है; लेकिन भारत ने ऐसा कुछ भी किया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। पहलगाम हमले के बाद मोदी जी ने जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था, उस समय भी चीन भारत के खिलाफ लड़ने के लिए पाकिस्तान को भारी मात्रा में रसद मुहैया करा रहा था। इस वजह से भारत का नुकसान हुआ, भारत को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ समेटना पड़ा और
पहलगाम का बदला अधूरा
रह गया। अब हमारे सेना प्रमुख कह रहे हैं कि ‘हम ‘ऑपरेशन सिंदूर-२’ के लिए तैयार हैं।’ यह यकीनन गर्व की बात है, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर-१’ का क्या हुआ? क्या वह पूरा हुआ? लाहौर, कराची और पाक अधिकृत कश्मीर पर तिरंगा फहराने की जो गर्जनाएं तब भाजपा नेता और उनकी सरकार कर रही थी, उन गर्जनाओं का क्या हुआ? क्या पाक प्रायोजित आतंकवाद का सफाया हो गया? ऐसे कई सवाल बिना जवाब के लटके हुए हैं। या फिर पश्चिम बंगाल और असम का विधानसभा चुनाव जीत लेने से सीमापार का आतंकवाद और घुसपैठ का मुद्दा हल हो गया? भारत सरकार को इन सभी सवालों के जवाब देने ही होंगे। पहलगाम हमले में इस्तेमाल हुए मोबाइल चीन से आए थे, इस बात पर क्या केंद्र सरकार ने चीनी सरकार से कोई जवाब तलब किया? ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समेटे जाने के बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुनीर को ‘डिनर’ के लिए खास तौर पर ‘व्हाइट हाउस’ आमंत्रित किया था। उनके सैन्य नेतृत्व और भारत के खिलाफ दिखाए गए शौर्य की तारीफ की थी, इसे भी भुलाया नहीं जा सकता। पाकिस्तान एक ‘कंगाल’ देश है, ऐसा ढिंढोरा भले ही हम पीटते रहें, लेकिन अमेरिका और चीन अपने फायदे के लिए पाकिस्तान को शह दे रहे हैं; और अब इसमें ईरान तथा तुर्की जैसे देश भी शामिल हो गए हैं, जो भारत के लिए एक बड़ा सिरदर्द है। चिंता की बात यह है कि सीमा पर स्थित एक भी देश अब भारत का दोस्त नहीं रहा। नेपाल के प्रधानमंत्री ने तो खुलेआम कह दिया कि भारत की एक बड़ी जमीन नेपाल के कब्जे में है। मतलब अब नेपाल भी भारत को कुछ नहीं समझता और वह पूरी तरह चीन की गोद में जा बैठा है। नेपाल के दुनिया का
इकलौता हिंदू राष्ट्र होने का
गर्व कभी सबको हुआ करता था। लेकिन अब नेपाल चीन की उंगली पकड़कर बहुत आगे निकल चुका है और भारत से दिल से कोसों दूर हो गया है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? पंडित नेहरू के दौर में भारतीय सीमा से सटे सभी देशों के साथ बेहतरीन दोस्ती और संवाद हुआ करता था, जो अब गायब हो चुका है। प्रधानमंत्री इटली जैसे देशों के दौरे पर तो जाते हैं, लेकिन सीमा पर स्थित इन छोटे देशों का दौरा करके उनका मन टटोलना प्रधानमंत्री मोदी को जरूरी नहीं लगता। पहलगाम जैसे भयानक हमले के बाद भी एक भी देश भारत के पक्ष में मजबूती से खड़ा नहीं हुआ। आतंकवाद की सिर्फ निंदा करना अलग बात है और ऐसे संकट के समय चट्टान की तरह पीछे खड़े रहना अलग बात है। जैसे ईरान के पीछे चीन, रूस, यमन और तुर्की खड़े हो गए और पाकिस्तान के पीछे चीन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी; भारत के लिए ऐसा कौन सा देश खड़ा हुआ, यह बताते नहीं बनता। ‘पंचशील’ के सारे सिद्धांतों को हमने दफन कर दिया। गुटनिरपेक्षता की नीति को हमने किनारे कर दिया। हकीकत तो यह है कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति बेहद डगमगा गई है। १४० करोड़ की आबादी वाला यह भूभाग दुनिया के नक्शे पर सिफर साबित हो रहा है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। रुपया मृतप्राय हो चुका है। अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए रिजर्व बैंक ने देश के खजाने से ८३ टन सोना बेच दिया। देश को अंधेरे में रखकर यह सब किया गया; एक दिन यह देश भी बेच देंगे! देश रसातल में जा रहा है और हमें इस मामूली सी बात में अपना शौर्य नजर आ रहा है कि ‘पहलगाम हमले के मोबाइल चीन से आए थे’। अगर पहलगाम हमले में चीन का हाथ होने के इतने पुख्ता सबूत हैं, तो कम से कम चीन की निंदा करने की हिम्मत तो हमें दिखानी चाहिए। मगर ऐसा कुछ भी होता हुआ नहीं दिखा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत आज पूरी तरह दिग्भ्रमित सा नजर आ रहा है। और यही हमारे देश की वर्तमान स्थिति है।

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