मराठी मानुष के लिए आज का दिन स्वर्णिम है। छत्रपति शिवाजी महाराज जिस मिट्टी में जन्मे, जिस भूमि में उन्होंने विश्व के पहले ‘हिंदवी स्वराज्य’ की स्थापना की, आज उस महाराष्ट्र का स्थापना दिवस है। आज महाराष्ट्र का जन्मोत्सव है। इस जन्मोत्सव में लाखों-लाखों मराठी जनता को सम्मिलित होकर महाराष्ट्र के लिए अपना बलिदान देनेवाले १०६ हुतात्माओं का स्मरण करना चाहिए। सरकारी स्तर पर हमेशा की तरह महाराष्ट्र दिवस मनाया जाएगा। परेड और सलामी के कार्यक्रम होंगे। महाराष्ट्र में मराठी मानुष के कल्याण की घोषणाओं की कृत्रिम वर्षा भी की जाएगी। ‘मुंबई केवल मराठी मानुष की है’ ऐसा दावा किया जाएगा और ‘हम ही महाराष्ट्र धर्म के रक्षक हैं’ जैसी डींगें हांकी जाएंगी। किंतु दिन ढलते ही महाराष्ट्र दिवस को बिसराकर सत्ताधारी महाराष्ट्र के वैभव का सौदा करना शुरू कर देंगे। आज के महाराष्ट्र का यह चित्र अत्यंत विचलित करने वाला है। १ मई जिस प्रकार महाराष्ट्र दिवस है, उसी प्रकार यह अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस भी है। महाराष्ट्र निर्मिती का ‘मंगल कलश’ १ मई को ही लाने का मुहूर्त इसलिए निकला क्योंकि मुंबई महाराष्ट्र को दिलाने के लिए मिल मजदूरों, किसानों और मेहनतकशों ने लंबा संघर्ष किया था। क्या उन मेहनतकशों की ‘मुंबई’ आज वास्तव में बची है? महाराष्ट्र
प्रगति पथ पर
पहले से ही था, किंतु आज यह प्रगतिशील और प्रगतिवादी महाराष्ट्र अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड के अजगरी शिकंजे में फंस गया है। इस शिकंजे को तोड़कर मराठी जनों की आंखों पर छाई धुंध को साफ करने का कार्य अब महाराष्ट्र में करना होगा। मराठी जनता को ढोंगी बाबाओं और कर्मकांडों के जाल में फंसाकर ‘राज्य’ को लूटने का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। जब यह राष्ट्रीय षड्यंत्र स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, तब भी रायगड जागृत नहीं हो रहा और न ही मराठी जन उद्वेलित हो रहे हैं। शाहिरों की लोक-गाथाओं (पोवाड़ों) में वर्णित मराठों की वह वीरता कहां लुप्त हो गई? यह एक रहस्य ही है। महाराष्ट्र आज लाचार और दबे हुए शासकों के हाथों में चला गया है। मराठी मन व्याकुलता के भंवर में फंसा है। दिल्ली के सत्ताधारी उठते-बैठते छत्रपति शिवराय का नाम तो लेते हैं, किंतु उन्हीं के शासनकाल में स्कूली पाठ्यक्रम से छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा साम्राज्य का इतिहास हटाने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम से मराठा साम्राज्य का मानचित्र हटाना हो या सीबीएसई के पाठ्यक्रम में महाराज के गौरवशाली इतिहास को मात्र ६८ शब्दों में समेट देना,यह सब इसी
साजिश का हिस्सा
है। मराठी भाषा को ‘अभिजात भाषा’ का दर्जा देने के नाम पर केंद्र सरकार की वाहवाही करनेवाले सत्ताधारी, मराठी पर तीसरी भाषा के रूप में हिंदी थोपने का प्रयास कर रहे हैं। वे बंद हो रहे मराठी स्कूलों की ओर से आंखें मूंदे हुए हैं। मुंबई जैसे महानगरों में प्राइम लोकेशन पर स्थित मराठी स्कूलों की जमीनों पर इनकी कुदृष्टि है। स्कूल बंद होते ही उन भूखंडों का लाभ वैâसे उठाया जाए, सत्ताधारी यही स्वप्न देख रहे हैं। स्वतंत्र महाराष्ट्र राज्य का आज ६७वां स्थापना दिवस है, किंतु आज भी मुंबई के ऑटोरिक्शा चालक मराठी बोलने से इनकार करते हैं। सत्ताधारी उनके आगे नतमस्तक होकर मराठी की अनिवार्यता वाले निर्णयों को स्थगित कर रहे हैं। अब समय आ गया है कि मराठी मानुष स्वयं इस अनिवार्यता के लिए दबाव बनाएं। महाराष्ट्र का स्वाभिमान और मराठी अस्मिता, केंद्र के महाराष्ट्र-विरोधी और राज्य के विवश शासकों के बीच दम तोड़ रही है। महाराष्ट्र और मराठी अस्मिता की मशाल को बुझाने का जो राष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है, उसे मराठी जनता को विफल करना ही होगा। इसके लिए ‘महाराष्ट्र धर्म’ की हुंकार एक बार फिर भरनी होगी।
