मुख्यपृष्ठनए समाचारफडणवीस की पुलिस सुप्रीम कोर्ट के नियमों की उड़ा रही धज्जियां!

फडणवीस की पुलिस सुप्रीम कोर्ट के नियमों की उड़ा रही धज्जियां!

गर्भपात कराने वाली लड़कियों की पहचान बताने के लिए डॉक्टरों पर बना रही प्रेशर
मुंबई हाई कोर्ट ने लगाई फटकार
सामना संवाददाता / मुंबई
हाई कोर्ट ने राज्य पुलिस को जमकर फटकार लगाई है। कोर्ट ने इस बात को लेकर कड़ी नाराजगी जताई कि पुलिस डॉक्टरों को परेशान कर गर्भपात करानेवाली नाबालिग लड़कियों के नाम और पहचान बताने के लिए उन पर प्रेशर बना रही है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह निर्देश दे चुका है कि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है। न्यायमूर्ति रेवती मोहिते-डेरे और नीला के. गोखले की खंडपीठ ने मुंबई के एक स्त्री रोग विशेषज्ञ की याचिका पर आदेश पारित किया, जिसमें यह निर्देश मांगा गया था कि वह सह-याचिकाकर्ता नाबालिग लड़की का चिकित्सकीय गर्भपात उसकी पहचान पुलिस को बताए बिना कर सकें। याचिकाकर्ता की ओर से वकील मीनाज काकालिया ने सुप्रीम कोर्ट के २०२२ के पैâसले का हवाला दिया, जिसमें यह माना गया था कि पॉक्सो कानून उन पर भी लागू न हो जाए, ऐसी आशंका के कारण चिकित्सकों में भय रहता है, जिससे सुरक्षित और वैध गर्भपात तक पहुंच बाधित होती है। अदालत ने देखा कि याचिकाकर्ता नाबालिग लड़की की एक परिचित लड़के से आपसी सहमति से संबंध बने थे, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हुई और अब वह और उसके माता-पिता १३ सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करना चाहते हैं।
‘यह गर्भपात की कानूनी सीमा के भीतर है, जिसे मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट १९७१ के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है। हाई कोर्ट ने कहा कि नाबालिग के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह स्वाभाविक है कि वह और उसके माता-पिता उसकी पहचान उजागर नहीं करना चाहते। काकालिया ने यह भी तर्क दिया कि पिछले साल मई में हाई कोर्ट की एक समन्वय पीठ ने एक अन्य नाबालिग लड़की का पहचान उजागर किए बिना गर्भपात कराने की अनुमति दी थी, जो कि सुप्रीम कोर्ट के पैâसले पर आधारित थी। हाई कोर्ट ने डॉक्टर को नाबालिग लड़की की गर्भपात करने की अनुमति दी, लेकिन बिना इस पर जोर दिए कि उसका नाम और पहचान बताई जाए।’ ‘हमें इस बात पर आश्चर्य है कि सुप्रीम कोर्ट और इस अदालत के बार-बार यह स्पष्ट करने के बावजूद कि ऐसे मामलों में नाबालिग लड़की की पहचान उजागर करना अनिवार्य नहीं है, फिर भी डॉक्टरों को इस अदालत का रुख करना पड़ रहा है, क्योंकि पुलिस अधिकारी उनसे नाम और पहचान बताने पर जोर देते हैं।

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