संडे स्तंभ : विमल मिश्र
मुंबई की स्काईलाइन पर चमकने वाली मुंबई की मशहूर इमारत कौन सी है? निश्चित रूप से सागर तीरे क्वींस नेकलेस की सबसे सुपरिचित पहचान एयर इंडिया बिल्डिंग। एक जमाने में इसकी छत पर मौजूद एयर इंडिया के ‘महाराजा’ का विराट लोगो मीलों दूर से दिखाई देता था और लोग समझ जाते थे कि मरीन ड्रॉइव अब दूर नहीं। आज भी मुंबई जब रात की बांहों में सिमटी हो तो उस पार मलबार हिल की गोद में बैठे राजभवन सहित मरीन ड्रॉइव का पूरे ३६० डिग्री के कोण में इससे खूबसूरत नजारा रंग-बिरंगी रोशनियों में चमचमाती कहीं और से नहीं दिखेगा। लाल-पीले लोगो पर मौजूद एयर इंडिया का यह महाराज सचमुच, क्वींस नेकलेस का महाराजा ही था, जब तक टाटा ग्रुप ने इसकी कमान नहीं संभाली और अब इसकी मालिक महाराष्ट्र सरकार है।
२ सितंबर, २०२६ को वह हुआ, जो अटल था। महाराष्ट्र सरकार द्वारा इसे अपने कार्यालयों के लिए खरीदे जाने के बाद अल्यूमीनियम शीट्स से बना इसका लोगो हटाकर आहिस्ता से बिल्डिंग की २२वीं मंजिल पर स्टोर में धर दिया गया और इस तरह मरीन ड्रॉइव के क्षितिज की यह सितारा पहचान सदा-सदा के लिए ओझल हो गई।
रोचक दास्तान
२,२०,००० वर्ग फुट क्षेत्र में पैâली २२ (बोर्ड रूम को लेकर २३) मंजिली एयर इंडिया बिल्डिंग की हर मंजिल पर कम से कम १०,८०० वर्ग फुट की जगह है। एक्सप्रेस टॉवर और ओबेरॉय शेरेटन टॉवर के साथ मरीन ड्रॉइव की सबसे पहली बहुमंजिली इमारतों में एक यह इमारत अपने आप में कई रोचक दास्तानों को समेटे हुए है। सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग और क्रास वेंटिलेशन के साथ एयर इंडिया बिल्डिंग मुंबई की शायद पहली इमारत है, जिसमें एस्केटर के साथ सभी छहों लिफ्ट्स में उस समय से पाइप्ड-म्यूजिक की व्यवस्था है। इसमें १,५०२ तो खिड़कियां ही हैं। इसकी लिफ्ट्स की प्लानिंग इस तरह की गई थी कि जब एक लिफ्ट ऊपर जाए, तब दूसरी नीचे आती रहे, ताकि प्रतीक्षा का समय कम से कम हो। इसी तरह जब मल्टी -लेवल पार्किंग आम नहीं हुई थी, इसमें अंडरग्राइंड पार्किंग तक डबल लेयर होती थी। न्यू यार्क की मशहूर आर्किटेक्ट फर्म जॉन बर्गी द्वारा डिजाइन इस बिल्डिंग को महानगर की सबसे अच्छी डिजाइन वाली इमारतों के साथ अग्नि सुरक्षा की दृष्टि से सबसे सुरक्षित इमारतों में भी गिना जाता है। मरीन ड्रॉइव के इस शाहकार का निर्माण जिस समय शुरू हुआ, एयर इंडिया के चेयरमैन जे. आर. डी. टाटा थे। १९७४ में जब यह खुली तब इसके प्रति उत्कंठा का यह हॉल था कि उसे एक नजर देखने के लिए मरीन ड्रॉइव जाम हो गया। यहां तक की भीड़ पर नियंत्रण के लिए पुलिस की विशेष व्यवस्था करनी पड़ी।
कलाकृतियों का खजाना
एयर इंडिया विश्व की ऐसी एकमात्र एयरलाइन होगी, जिसके पास कलाकृतियों का इतना अमूल्य खजाना है। बहुत सी कलाकृतियां खुद जे.आर.डी. टाटा की खरीदी हुई हैं। ज्यादातर संग्रहीत चीजों के पीछे कोई न कोई कहानी है। यहां रखी करीब ७,००० कलाकृतियों में ४,००० चित्र, म्यूरल, काष्ठ प्रâेम आदि हैं। मधुबनी, वार्ली, फुलकारी, कलमकारी, पिछवई जैसी लोककलाओं और राजपूत और मुगल पेंटिंग्स के उत्कृष्ट नमूने, पुरानी घड़ियों, कपड़ों और परिधानों का संग्रह तो देखते ही बनता है। पत्थरों में उत्कीर्ण कुछ कलाकृतियां तो नौवीं शताब्दी की हैं। सल्वाडोर डाली, एम. एफ. हुसैन, वी. एस. गायतोंडे, तैयब मेहता, एस. एच. रजा, बी. प्रभा, जी. आर. संतोष, के. एच. आरा, एन. एस. बेंद्रे, जतिन दास, मनु पारीख, लक्ष्मण श्रेष्ठ, अंजोली इला मेनन, पीटर अर्नो, पीलू पोचखानवाला, राघव कनेरिया और मारियो मिरांडा जैसे विश्वविख्यात कलाकारों की मौजूदगी ने छह दशकों के इस संग्रह को अमूल्य बना दिया है।
बहरहाल, एयर इंडिया इमारत में डॉयरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग, भारतीय पर्यटन, बैंक ऑफ इंडिया, आयकर और सेवाकर विभागों और टाटा कंसल्टेंसी सर्विस जैसी ३० कंपनियों के दफ्तर थे। एयर इंडिया ने सबसे ऊपर की २१, २२वीं और २३वीं मंजिलें अपने लिए सुरक्षित रखी हुई थीं। तल माले पर बुकिंग ऑफिस सहित। १३वीं मंजिल कुछ अंधविश्वासों को लेकर बंद पड़ी है।
आतंकवाद का कहर
१२ मार्च, १९९३ को मुंबई पर जब आतंकी हमला हुआ तो शृंखलाबद्ध विस्फोटों से प्रभावित इमारतों में एयर इंडिया बिल्डिंग को भी भारी नुकसान पहुंचा। यह विस्फोट बिल्डिंग के बेसमेंट में स्थित गैरेज में हुआ। गैरेज के ठीक ऊपर बैंक ऑफ ओमान तो बिलकुल तहस-नहस ही हो गया। विस्फोट ने २० जानें लीं और करीब १०० घायल हो गए। यहां बम रखने के आरोप में फारूख पावले को मौत की सजा सुनाई गई।
२००७ में इंडियन एयरलाइंस के साथ विलय होने के बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी की माली हालत लगातार गिरती जा रही थी। कर्ज का बोझ जब अपार हो गया तो नागरिक विमानन मंत्रालय द्वारा एयर इंडिया बिल्डिंग को बेच देने की चर्चाएं चलने लगीं। २०१३ में तो एयर इंडिया का मुख्यालय ही मुंबई से हटकर दिल्ली चला गया। २०१८ आते-आते यह लगभग तय हो गया कि अब यह बिककर ही रहेगी। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, जीवन बीमा निगम और भारतीय रिजर्व बैंक ने भी शुरुआती रुचि दिखाकर अपने कदम वापस खींच लिए। जिस जमीन पर आज यह खड़ी है, उसका मालिकाना हक महाराष्ट्र सरकार के पास ही था, जिसने इसे एयर इंडिया को १९७० में ९९ वर्ष की लीज पर दिया था। केंद्र सरकार ने इसे १६०१ करोड़ रुपए में महाराष्ट्र सरकार को हस्तांतरित करने की अनुमति देकर इसके भविष्य को लेकर वर्षों से चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया। २ सितंबर, २०२६ में मरीन ड्रॉइव की तेज हवा के बीच कुशल इंजीनियरों की निगरानी में आठ मजदूरों ने छह दिन की मेहनत से इसे इसके लोगो को हटा दिया, जिसे इमारत की २२वीं मंजिल पर सुरक्षित रखा गया है। एयर इंडिया असेट्स होल्डिंग कंपनी से समझौते के बाद इसकी जगह लेगा इमारत का नया लोगो, जिसे जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स डिजाइन करने वाला है।
महाराष्ट्र सरकार इसके ४६,४७० वर्ग मीटर स्थान का इस्तेमाल अपने कार्यालयों के लिए करने वाली है। इसकी २३वीं मंजिल पर खुद मुख्यमंत्री का अपना ऑफिस होगा। पर इससे पहले बिल्डिंग की खराब हालत को देखते हुए १८१ करोड़ रुपए लागत से इसकी मरम्मत कराई जानी है। इसका उपयोग चाहे जो भी हो। पर जब तक यह है एक बार तय है, लोगों की जुबान पर यह ‘एयर इंडिया बिल्डिंग’ के नाम से ही अमर रहेगी।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
