राजेश सरकार | प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर तीखा प्रहार करते हुए स्पष्ट कहा है कि फरार आरोपी को पकड़ने के नाम पर उसके परिजनों को परेशान करना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि संविधान की भावना के भी खिलाफ है। न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त टिप्पणी की।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि पुलिस उसके घर पर लगातार दबिश दे रही है और उसे तथा उसकी पत्नी को थाने बुलाकर बेटे के ठिकाने के बारे में जानकारी देने के लिए दबाव बना रही है।
मामले में सामने आया कि याचिकाकर्ता का पुत्र संदीप तोमर दहेज हत्या के मामले में दोषी है और उसकी अपील पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। इसके बावजूद अदालत ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आशुतोष कुमार सिंह के तर्कों को ध्यानपूर्वक सुनते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी की तलाश के नाम पर परिवार को प्रताड़ित करना कानून के दायरे में नहीं आता।
हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “किसी बेटे को त्यागने का कोई प्रमाण पत्र नहीं होता” और इस आधार पर पुलिस द्वारा सवाल उठाना पूरी तरह गलत और भ्रामक है। साथ ही अदालत ने पुलिस की इस कार्यप्रणाली को “ब्रिटिश दौर की पुरानी और असंवैधानिक पद्धति” बताया, जो आज के आधुनिक और तकनीकी युग में स्वीकार्य नहीं है।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी को बार-बार थाने बुलाया गया, जो उनके निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने इसे पूरी तरह अवैध करार दिया।
अंत में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि वह याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार से परेशान न करे, न ही थाने बुलाए और न ही उसके घर पर दबिश दे। साथ ही थाना गुजैनी, जनपद कानपुर नगर के तत्कालीन थाना प्रभारी को कड़ी चेतावनी देते हुए भविष्य में ऐसी कार्रवाई से बचने को कहा गया है।
इस फैसले को पुलिस कार्यप्रणाली के लिए एक सख्त संदेश माना जा रहा है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि कानून का पालन करते हुए ही कानून लागू किया जा सकता है।
