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हुक्का बारों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा…“यह मौलिक अधिकार नहीं, सरकार लगा सकती है प्रतिबंध”

राजेश सरकार / प्रयागराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हुक्का बार संचालकों को बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि हुक्का बार चलाना किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जनस्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है, इसलिए राज्य सरकार को ऐसे कारोबार पर रोक लगाने अथवा कड़े नियम लागू करने का पूरा अधिकार प्राप्त है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने यह अहम टिप्पणी हुक्का बार संचालकों द्वारा दाखिल याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की। याचिकाकर्ताओं ने प्रशासनिक कार्रवाई और लाइसेंस संबंधी प्रतिबंधों को व्यापार की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए राहत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हुक्का बारों में तंबाकू और निकोटीन का सेवन सीधे तौर पर लोगों की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ऐसे व्यवसाय को सामान्य व्यापार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हुक्का बार “रेस एक्स्ट्रा कमर्शियम” की श्रेणी में आते हैं, ठीक उसी तरह जैसे शराब और जुए से जुड़े कारोबार, जिन पर सरकार नियंत्रण या पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए स्वतंत्र है।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। सार्वजनिक हित, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सरकार आवश्यक प्रतिबंध लागू कर सकती है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में हुक्का बारों के खिलाफ प्रशासनिक सख्ती और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। इस फैसले को जनस्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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