सामना संवाददाता / मुंबई
सुप्रीम कोर्ट ने दलबदलुओं को लेकर बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये मुद्दा देशभर में बहस का विषय रहा है और यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया तो ये लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने संसद में दिए गए कई नेताओं के भाषणों का हवाला देते हुए कहा कि विधायक-सांसद की अयोग्यता तय करने का अधिकार स्पीकर को इसलिए दिया गया, ताकि अदालतों में वक्त बर्बाद न हो और मामला जल्दी सुलझ जाए। कोर्ट के इस टिप्पणी को महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी जैसे दलों के साथ घात करने वाले गद्दारों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति के १० विधायकों के दल-बदल और उनकी अयोग्यता के मामले में सुनवाई करते हुए यह कड़ा रुख अपनाया है।
स्पीकर की भूमिका पर कोर्ट ने जताया संदेह
दलबदल मामले में समय पर फैसला जरूरी
कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि यदि दलबदल मामले में समय रहते पैâसला नहीं किया गया तो यह लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है। साथ ही कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा के स्पीकर को निर्देश दिया कि वह इस मामले में अगले तीन महीनों में पैâसला लें। ऐसे में स्पीकर की भूमिका को लेकर भी कोर्ट ने संदेह व्यक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि स्पीकर की भूमिका जूडिशल रिव्यू से परे नहीं है। यानी सदन में लिए गए या ना लिए गए निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है और कोर्ट उसे सुनकर समुचित निर्णय दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दल बदलुओं को लेकर बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये मुद्दा देशभर में बहस का विषय रहा है और यदि समय रहते इसे नहीं रोका गया तो ये लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने संसद में दिए गए कई नेताओं के भाषणों का हवाला भी दिया। कोर्ट ने राजेश पायलट, देवेंद्रनाथ मुंशी जैसे सांसदों के भाषणों का जिक्र करते हुए कहा कि विधायक-सांसद की अयोग्यता तय करने का अधिकार स्पीकर को इसलिए दिया गया, ताकि अदालतों में वक्त बर्बाद न हो और मामला जल्दी सुलझ जाए।
