बेला विरदी
लम्बे उदास गलियारे में
खामोशी कहीं गुम हो गई।
खौफ की इतनी बर्फ गिरी,
सब्र की ही कब्र खुद गई।
रास्ते और मंजिले
इस तरह गुम हुईं कि
कोई भी निशान हाथ न आया।
सारी तमन्नाएं तड़प कर
ज़िंदा ही दफन हो गईं।
एक भी लफ्ज बोलने के लिए
उनके लब तक न हिले।
एक साथ जीने-मरने की
कसमें खाई थीं हमने।
कयामत तक साथ-साथ चलने का
वादा भी किया था, मगर
मेरी सांसें चल रही थीं,
तुम मुर्दा समझ कर लौट गए।
कितना भी मिटाए जाओ,
नाकाम इश्क के निशान मिटते नहीं।
रूह कांप जाती है
उस नजारे का ख्याल करके,
जब अपना जनाजा
चार कंधों पर निकले।
