पंकज तिवारी
जबसे रुपाली का बियाह पड़ा था बेचारी अइया कुछ न कुछ सोच कर ही परेशान रहने लगी थी हालांकि परेशान तो वो पहले से भी थीं। पहले करीब तीन साल तक देखुआरी की चिंता में मरी जा रही थीं कि नातिन सयान होती जा रही है, एक-एक दिन साल-साल भर सा लगने लगा था और लड़का है कि पता नहीं कहां छिपा बैठा है जबकि देखुआरी में साइकिल का टायर, बुढ़ऊ का जूता और अइया का दिमाग लगातार घिसता जा रहा था। एक बार तो तय-तमाम तक हो गया था। जरूरी जगहों पर खबर भी पहुंच चुकी थी। लोग-बाग तो तैयारी में भी लग गये थे कि अचानक से मालुम चला लड़का मंगला है। ‘हाय दइया.. ई कइसन खेला होत बा हमरे नतिनिया के सथवा हो राम.., हे बिधना का ओका बदे केहू के नाइ बनये बाट्य काऽ? का ऊ इंहीं हमरे कपारेन पे मूंग दरे का? का हम अपने ऋण से उऋण न होइ पाउब हो राम?’.. जैसे पता नहीं कितने प्रश्न थे जो अइया हरहमेश ईश्वर से किया करती थी, कभी-कभी तो गुस्सा भी कर जाती तो कभी झल्लाहट में दिन भर बकर-बकर ही करती रहती, बेचारी रुपाली को उस दिन कुछ ज्यादा ही सुनना पड़ता था जैसे पैदा होकर उसने कोई गुनाह कर दिया हो पर सच तो ये था कि रूपाली को अब अइया के बातों से कुछ फरक ही नहीं पड़ता था। इन सभी से ऊपर उठ चुकी थी रूपाली। ददा उसे पहले ही एकांत में समझा चुके थे कि ‘हे बिटिया उ तोहार अइया हउ, बहुत फिकिर बा तोर ओका, यंह से कभंउ-कभंउ जादा परेशान होइ जाथऽ अउर पता नाइ काउ-काउ बोलि जाथऽ, इंहीं से कहिथऽ कि हे बिटिया अपने अइया के बाते क बुरा जिनि माना करु। ओकर बात यंह काने सुना करु अउर एकए काने निकाल दिहा करु अउर हमेशा खुश रहा करु बाकी हम बाटीऽ कुल ठीक कइ देब नातिन।’ तभी से रुपाली हर बात में मस्त रहने लगी थी।
एक कहावत है नऽ कि ‘बिटिया क बखान के करइ..? बिटिया के माई,’ यहां पर फेल दिखता नजर आ रहा था मतलब बिटिया से बिटिया के माई को जैसे कोई मतलब ही नहीं था। बस रोज सबेरे उठना, चउका-बासन सहित और तमाम कामों में भिड़े रहना और फुरसत मिलते ही स्वेटर, कन्टोपा बुनना। बस यही सब था जहां हमेशा उलझी रहती थी मां। खैर वो बच्चों के तरफ से शुरू से ही निश्चिंत रही हैं उन्हें हमेशा से ही पता रहा है कि जब तक घर में बूढ़-पूरनिया का वरदहस्त है हम आराम से सुकून की नींद लें सकते हैं। रुपाली की मां हमेशा अपने बच्चों के प्रति निश्चिंत रहा करती थी। रुपाली, मितई और मंगरू ये तीनों गदेले अपने ददा और दादी के साथ ही खेलने, खाने, गाने और मस्त रहने में मगन रहा करते थे। रुपाली सभी से बड़ी थी। इसीलिए अइया की परेशानी भी लाजमी थी, परेशान ददा भी थे पर देखुआरी से जब भी लौटते, खुश हैं कि दुखी ताड़ पाना मुश्किल होता था कारण गांव के मुहाने पर ही सजी भोंदू बबा के चाय-पान की दुकान और वहां सजने वाली महफिल थी। ददा कभी भी कहीं भी आने-जाने से पूर्व दस मिनट ही सही पर यहां बैठते जरूर थे। हंसना-मुस्कुराना, समाज के सामने खुल कर बोलना, राजनीति करना, बैठे-बैठे ही सरकार गिरा देना या किसी की सरकार बना देना सब यहां रोज होता था। ददा यहां बैठकर उसके बाद घर जाते थे सो देखुआरी में क्या हुआ उसका भाव घर तक पहुंचते-पहुंचते गायब हो जाता था। ददा के चेहरे पर दिखता था तो बस दुकान, चाय-पान या हंसी-मजाक के निशान। दादी कभी-कभार और भी परेशान हो उठती कि आखिर इतना दौड़ लेने के बाद भी ये खुश कैसे रह लेते हैं पर उन्हें कौन समझाए कि..। दादी खुदुर-खुदुर घर के बाहर का सारा काम निपटाती भी रहती और ददा पर निगाह भी गड़ाए रहती थी।
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
