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घाटकोपर लैंडस्लाइड: आठ साल पहले जीएसआई ने दी थी पहाड़ी धंसने की चेतावनी

-कुर्ला की पहाड़ी हादसे में आठ लोगों की मौत के बाद सरकारी लापरवाही पर उठे गंभीर सवाल
-एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले ३४ सालों में मुंबई में अलग-अलग जगहों पर हुए लैंडस्लाइड में ३४० लोगों की जान गई और करीब ३०० लोग घायल हुए। उसके बावजूद मनपा सोती हुई नजर आ रही है। मनपा शुरू से ही नोटिस जारी करके अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते आई है और नोटिस देकर यह स्पष्ट कहती है कि अगर जान माल का नुकसान हुआ तो वह जिम्मेदारी हमारी नहीं।

द्रुप्ति झा / मुंबई
घाटकोपर इलाके में पहाड़ी का हिस्सा ढहने से हुई आठ लोगों की मौत के बाद अब सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही सामने आती दिख रही है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) ने करीब आठ साल पहले ही मनपा को चेतावनी दी थी कि घाटकोपर की पहाड़ी नंबर-३ संवेदनशील है और वहां भूस्खलन का खतरा बना हुआ है। इसके बावजूद पहाड़ी को सुरक्षित करने के लिए सुझाए गए कई जरूरी उपाय कथित तौर पर जमीन पर नहीं उतारे गए। जीएसआई ने अपनी रिपोर्ट में पहाड़ी नंबर-३ पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत बताई थी। यह वही क्षेत्र है, जहां वर्ष २००५ से २००८ के बीच तीन अलग-अलग भूस्खलन की घटनाओं में १६ लोगों की मौत हुई थी, जबकि कम से कम २६ मकानों को नुकसान पहुंचा था। इन पुराने हादसों के बावजूद संवेदनशील पहाड़ी की सुरक्षा को लेकर प्रशासन की उदासीनता अब सवालों के घेरे में है और उसके बावजूद मनपा ने इस घटना से पहले कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
चेतावनी थी, लेकिन एक्शन नहीं
जीएसआई ने संभावित खतरे को देखते हुए कई तरह के बचाव और स्थिरीकरण के उपाय सुझाए थे। इन उपायों का उद्देश्य पहाड़ी की मिट्टी और चट्टानों को खिसकने से रोकना तथा बारिश के दौरान पानी के बहाव को नियंत्रित करना था। मुंबई में हर मानसून के दौरान भूस्खलन और पहाड़ी इलाकों में रहनेवाले लोगों की सुरक्षा को लेकर चेतावनियां जारी होती हैं। इसके बावजूद संवेदनशील क्षेत्रों में स्थायी सुरक्षा उपाय नहीं किए जाने से प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि खतरा पहले से ज्ञात था तो वहां रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट क्यों नहीं किया गया?
आठ मौतों के बाद जागेगा प्रशासन
घाटकोपर हादसे ने मुंबई की पहाड़ियों और ढलान वाले इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों की सुरक्षा का सवाल फिर खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों की चेतावनी यदि सरकारी फाइलों में दबकर रह जाए और कार्रवाई हादसे के बाद शुरू हो तो इसे महज प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही माना जाएगा। अब जरूरत केवल जांच समिति बनाने की नहीं, बल्कि जीएसआई की पुरानी रिपोर्ट में सुझाए गए सभी सुरक्षा उपायों की समीक्षा, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और मुंबई की सभी संवेदनशील पहाड़ियों का तत्काल सुरक्षा ऑडिट करने की है।

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