मुख्यपृष्ठस्तंभदिल्ली लाइव: कौन चुकाएगा १७५.६ करोड़ की ‘कीमत’?

दिल्ली लाइव: कौन चुकाएगा १७५.६ करोड़ की ‘कीमत’?

अरुण कुमार गुप्ता

-संसद का मानसून सत्र खत्म, सवालों का हिसाब बाकी
संसद का मानसून सत्र १३ अगस्त को खत्म हो गया, लेकिन इसके साथ राजनीतिक टकराव खत्म नहीं हुआ। २० जुलाई से शुरू हुए इस सत्र में बार-बार हंगामा, नारेबाजी और स्थगन देखने को मिला। नतीजा यह रहा कि लोकसभा की उत्पादकता केवल १९ प्रतिशत और राज्यसभा की ३९ प्रतिशत रही। सबसे ज्यादा चर्चा अब उस आर्थिक कीमत की हो रही है, जो संसद के बाधित कामकाज के साथ जोड़ी जा रही है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक, करीब ७,०२३ मिनट का संसदीय समय हंगामे और स्थगन में चला गया। संसद की कार्यवाही की पुरानी अनुमानित लागत २.५ लाख प्रति मिनट मानने पर यह रकम लगभग १७५.६ करोड़ बैठती है। यह प्रति-मिनट लागत के आधार पर निकाला गया अनुमान है। इसलिए इसे ‘बर्बाद संसदीय समय की अनुमानित कीमत’ कहना अधिक सही होगा, लेकिन असली सवाल यह है कि इन कानूनों पर कितनी संसदीय बहस हुई? संसद में कानून बनते रहे, लेकिन संसद में बहस घटती रही। प्रश्नकाल सरकार से जवाब मांगने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। सांसद जनता की समस्याएं उठाते हैं, मंत्री जवाब देते हैं और सरकार की नीतियों की जांच होती है। जब कार्यवाही बार-बार स्थगित होती है तो केवल घड़ी के मिनट नहीं जाते, बल्कि जवाबदेही का अवसर भी चला जाता है। अब सवाल बिल्कुल सीधा है, जिस संसद को चलाने पर जनता का पैसा खर्च होता है, वहां जनता के सवालों पर कितनी देर चर्चा हुई?
नेहरू का भारत, मोदी का भारत!
आजाद हिंदुस्थान में हमेशा देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की चर्चा होती है। यही नहीं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाहे-बगाहे नेहरू जी पर उंगुली उठाने में बिल्कुल संकोच नहीं करते हैं, लेकिन दोनों में फर्क साफ है। एक वक्त था कि सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता नेहरू के भारत से संबंध बनाए रखने के लिए बदलाव कर रही थी। एक वक्त था जब नेहरू इंडो-चीन संकट (१९४६-१९५४), कोरियाई युद्ध (१९५०-५३), स्वेज नहर संकट (१९५६) और कांगो संकट (१९६०) सुलझा रहे थे। नेहरू भारत की ख्याति बढ़ा रहे थे, यह बता रहे थे कि यह देश गांधी का है। यहां अहिंसा ऐसे अदम्य साहस के साथ रहती है कि बर्बरता को मुंह छिपाने की जगह भी नहीं मिलती। नेहरू द्वारा दिए गए ‘६-सूत्रीय शांति प्रस्ताव’ (इंडो-चीन मामले में), ‘नेहरू का मध्यस्थता फॉर्मूला’ (कोरिया युद्ध) ने भू-राजनीति को भारत की तरफ मोड़ दिया था। कांगो मामले में तो नेहरू जी ने जिस तरह तत्काल ५,००० शांति सैनिकों को भेजकर कांगो को अस्थिरता से बाहर निकाला वह मिसाल थी। स्वेज नहर मामले में जब ब्रिटेन, प्रâांस तथा इसरायल ने मिस्र पर हमला कर दिया, तब नेहरू ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा संभाल लिया। १ नवंबर १९५६ को हैदराबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरू ने इस आक्रमण को ‘स्पष्ट और नग्न आक्रमण’ करार दिया था। नेहरू के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत ने इसे ‘औपनिवेशिक आक्रमण का एक पुराना और क्रूर रूप’ कहा, जिसे आधुनिक दुनिया में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह नेहरू थे, यह उनका कद था। भारत तब ऐसा था; नैतिक, साहसी, लोकतांत्रिक और सजग! और अब मोदी का भारत देखिए, हर मोर्चे पर फेल। सिर्फ और सिर्फ दो बड़े उद्योगपतियों के लिए काम। यही नहीं, अमेरिका का पिछलग्गू बनकर देश की जनता को उसकी कीमत चुकाने के लिए छोड़ना ही बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।

अन्य समाचार