यात्रा जीवन की

खोने, पाने में बीत जाता जीवन
कब रुकता है इसका क्रम।
जब भी पाता जीवन में स्वर्णिम क्षण
ऊंची उड़ान भरती पताका अहं की।
खोने की पीड़ा से घायल होता अन्तर्मन
उत्तरदाई बनता केवल भगवन।
पाप-पुण्य माला के मनके
मानव फेरता पूरे जीवन भर।
पुण्य कर्मों का श्रेय अपने कंधों पर
किए पाप जो, उन पर हो जाता मौन।
सत्य-असत्य के झूले में झूलता जीवन
सतत चलते अनुलोम-विलोम से संग-संग।
सत्य का ओढ़न लगता भारी
दिखता असत्य हरदम चमत्कारी।
धूप-छांव में चलती जीवन यात्रा
अभावों की धूप जलाती तन मन
सुख छांव के बादल उड़ जाते तत्क्षण।
जीवन एक जंग है, यही परम सत्य है
हर अंगड़ाई में बदल जाती रिश्तों की मिठास
कड़वाहट ही बस रह जाती याद।
हार-जीत तेरे अंग-संग है,
यही जीवन यात्रा का मंत्र है।
-बेला विरदी

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