शिलालेख / हृदयनारायण दीक्षित
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का प्रसाद है सर्वत्र। इतिहास अतीत होता है। बीता हुआ इतिवृत्त। लेकिन श्रीकृष्ण इतिहास से बड़े हैं। वे पुराणों का भी अतिक्रमण करते हैं। वे इतिहास पुराण में होकर भी भूत नहीं। व्यतीत अतीत भी नहीं। वे प्रतिपल सतत प्रवाहमान प्रेम छंद हैं। सुदूर अतीत से लेकर अद्यतन संगीतमय। वे भविष्य में भी हैं। जो हो चुका है, वहां, जो आज प्रतिपल प्रत्यक्ष है यहां जो आगे होगा, समय के उस चक्र पर भी सुदर्शन चक्र लेकर सतत गतिमान हैं श्रीकृष्ण। हम सबकी संभावना हैं वे। सम्भवामि युगे युगे वैयक्तिक घोषणा नहीं है। सम्भवन प्रकृति का गुणधर्म है। प्रकृति का हर एक अणु नृत्य मगन है। परमाणुओं का यह नृत्य उसी परम-चरम की रासलीला है। यह नृत्य प्राकृतिक है।
दुनिया की सभी आस्थाओं का आदर है, लेकिन नाचता हुआ देवता अन्यत्र दुर्लभ है। वह भी बांसुरी बजाता, स्वयं नाचता, सबको नचाता देवता। नाचने वाला यह देवता प्रेमरस से भरता है पूरी प्रकृति को। प्रकृति के भीतर होता है, प्रकृति का आच्छादन करता है और प्रकृति को आवृत्त भी करता है। डंके की चोट पर युद्धभूमि में खड़े होकर अर्जुन से कहता है `यह प्रकृति मेरी ही अध्यक्षता में काम करती है अर्जुन।’ जगत् गतिशील है। नृत्य इसीलिए जगत् एक परिपूर्ण नृत्य है।
श्रीकृष्ण संपूर्ण मनुष्य हैं और हम अपूर्ण। पुराण इतिहास उन्हें सभी १६ कलाओं से पूर्ण बताते हैं। हम कलाओं का ठीक अर्थ भी नहीं निकाल पाते।
कृष्ण बुद्धि युक्ति की पकड़ में नहीं आते। वैज्ञानिक भौतिकवाद काम नहीं करता। दार्शनिक यथार्थवाद से भी काम नहीं चलता। आस्था और विश्वास हमारी विद्यार्थी बुद्धि के उपकरण नहीं। सोचता हूं कि हमसे ज्यादा ज्ञानवान तो गोपियां ही थीं। उन्होंने कृष्ण को अपने सहज प्रेम की आंखों से पूरा का पूरा जान लिया था। वैज्ञानिक भौतिकवादी उन्हें काव्य कल्पना बताते हैं, लेकिन मुझे वे इतिहास के महानायक दिखाई पड़ते हैं। वे इतिहास में हस्तक्षेप करते हैं, इतिहास रचते हैं और तमाम अविश्वसनीय घटनाओं के कारण इतिहास के अंत:स्थल में समाते ही नहीं।
श्रीकृष्ण परिपूर्णता हैं। प्रकृति की चरम संभावना। सहज संसारी। असाधारण मित्र। अर्जुन से यारी हो गई तो उसका रथ हांका। चालक बने अर्जुन के। उसे विषाद हुआ तो विश्व का सारा ज्ञान उड़ेल दिया। संशय नहीं मिटा तो दिखा दिया विश्वरूप। विश्वरूप देखना कोई दैवी घटना नहीं है। हम सब विश्व में हैं। विश्व का भाग हैं।
विश्व प्रत्यक्ष है। हम विश्वदर्शन में रस लेते ही नहीं। सूर्योदय के उगने का भी दर्शन नहीं करते। हवाएं सहलाती आती हैं, हम उन्हें धन्यवाद भी नहीं देते। अनेक रूपों से भरा-पूरा यह विश्व हमारे भीतर विस्मय नहीं पैदा करता। चंद्र आभा, दीप्ति तारांगण विश्वरूप ही तो हैं। गीताकार के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपने भीतर विश्वरूप दिखाया। सच है यह बात। हमारे आपके सबके भीतर भी है विश्वरूप। श्रीकृष्ण जैसा मित्र मिले तो बात बने या अर्जुन जैसे विषादी जिज्ञासु हों हम सब। तो भी बन सकती है बात। श्रीकृष्ण ऐसी ही संभावना हैं। नाचते हुए दर्शन के रसपूर्ण प्रतीक। नटखट, मनमोहन और विंदास रसिया। सभी कलाओं से लबालब भारत के मन के इस महारस महासम्राट को नमस्कार करते हुए मन नहीं अघाता। प्रेमरस की प्यास बुझती ही नहीं।
विश्वरूप से अर्जुन भी आश्चर्यचकित हुआ। बोला, आपको सामने से नमस्कार! बाएं से नमस्कार!! दाएं से नमस्कार!!! पीछे से नमस्कार। पुन:-पुन: नमस्कार। श्रीकृष्ण को अतीत में देखना अच्छा नहीं लगता। निस्संदेह वे इतिहास पुरुष हैं, लेकिन वे वर्तमान में भी हैं। प्रजेंट कांटीनुअस। सतत् प्रवाह अंतहीन। दिग्दिगन्त् और अनंत। इतिहास के पास ऐसी जगह कहां? इतिहास के पास हृदय नहीं होता। श्रीकृष्ण हृदय में ही खिलते हहराते हैं। वर्तमान के पास रूखे तर्क हैं कि श्रीकृष्ण काव्य कल्पना हैं कि वे इतिहास के पात्र हैं नहीं। तर्क का क्या? न प्रेम, न भाव विह्वलता। न काव्य न संगीत। श्रीकृष्ण को आत्मसात करने के लिए प्रेम का आकाश चाहिए। इतिहास के पृष्ठ नहीं। वे इतिहास में नहीं समाते। इतिहास गढ़ते हैं और उसका अतिक्रमण भी करते हैं। श्रीकृष्ण को अंक में भरने के लिए भावविह्वलता का रस प्रतिपल मधुमास और मधुवातायन चाहिए। इठलाती ऊषा के नर्तन में, अरुण तरुण सूर्य की रश्मियों में, नदी के छंदस् नाद में, गौओं के चलने से उड़ी धूल की महक में श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण हैं। सावन के मेघ या भादौं की रात में चमकती विद्युत दीप्ति में कान्हा की ही दिव्यता है।
श्रीकृष्ण आकांक्षा रहित परम वैभव हैं। संग और असंग का असंभव संग। श्रीकृष्ण दर्शन का मुख्य सूत्र ही है-अनासक्ति। राग का भरपूर आस्वाद लेकिन राग से विराग। रसपूर्ण जीना लेकिन रस आसक्ति से दूर रहना। कर्म अभ्यास में डूबना, लेकिन वैराग्य में रहना-अभ्यासेन वैराग्येण च। जीवन के सभी अवसरों पर संग-संग प्रति प्रसंग असंग गति। युद्ध में पूरे मन से सम्मिलित रहना लेकिन युद्ध नहीं करना। कृष्ण ने राज्य और राजनीति में जमकर हस्तक्षेप किया, लेकिन राजसत्ता से दूर रहे। साधारण किसान की तरह गोपाल बने। असाधारण कलाकार की तरह मुरलीधर। हथियार भी असाधारण ही रखा। सुदर्शन चक्र। मन प्रश्न करता है कि यह सुदर्शन क्या है? सुदर्शन का मूल अर्थ है-सुंदर दर्शन।
विश्व में अनेक रूप हैं। सारे रूप अलग-अलग और विभाजित दिखाई पड़ते हैं। श्रीकृष्ण दर्शन में विश्व के रूपों को अलग-अलग देखना उचित नहीं कहा गया। उन्होंने अर्जुन को बताया कि `जो रूपों में विभाजित इस विश्व को अविभाजित और अखंड देखते हैं। वही वास्तव में सत्य देखते हैं।’ अस्तित्व एक है। यहां रूप, रंग, रस, ध्वनि और स्पर्श के करोड़ों आयाम हैं। लेकिन कोई पृथक नहीं। सब एक ही सत्ता के रूप-रूप प्रतिरूप हैं। ऐसा देखना, जानना, अनुभव में लेना ही सुदर्शन है। सुदर्शन कोरा दर्शन नहीं, सुंदर दर्शन ही है। सुदर्शन में जड़ता नहीं। यह गतिशील है, लेकिन गति चक्रीय है। सुदर्शन चक्र बड़ा प्यारा प्रतीक है।
श्रीकृष्ण भारत की दिव्यगंध हैं। संपूर्ण रसों के महारस, मधुरस, नृत्यरत भगवत्ता। साधना रहित सिद्धि। निष्काम कामना। इच्छारहित अभिलाषा। जीवन के हरेक रंग और आयाम में उनकी उपस्थिति है। वे रूप, रंग, हाव, भाव और गतिशीलता में सुदर्शन हैं। सभी लोकों के मनमोहन। दर्शन आत्मबोध होता है। तर्क-प्रतितर्क आधारित निष्कर्ष होते हैं दर्शन में। वे गतिशील नहीं होते। लेकिन श्रीकृष्ण का सुदर्शन गतिशील चक्र भी है। इस चक्र के केंद्र में प्रेम सत्य है और परिधि पर संसार। कालनियंता है इस चक्र का। काल में जन्म है और काल में ही तरुणाई। काल में ज्ञान है और काल के अतिक्रमण में मुक्ति। सुदर्शन चक्र में दर्शन के साथ कालबोध भी है। यह चक्र घूम रहा है। बारंबार। सृष्टि चक्र चल रहा है। बताते हैं `ऐसा कोई समय नहीं था अर्जुन! जब हम या तुम नहीं थे। हमारा तुम्हारा यहां बार-बार आना-जाना हुआ है। मैं यह बात जानता हूं, लेकिन तुम नहीं जानते।’ ठीक बात है। प्रकृति सदा से है। रूप परिवर्तनशील हैं, अनित्य हैं। मूल चेतना नित्य है, सदा से है।
‘सम्भवामि युगे युगे‘ का प्रतीक है सुदर्शन चक्र। कृष्ण की घोषणा है कि मैं ऋतुओं में वसंत और वेदों में सामगान हूं। मैं तर्क हूं, निर्णय हूं, राम हूं, कपिल हूं आदि-आदि। मुझे लगता है कि श्रीकृष्ण ही अपनी संपूर्णता में सुदर्शन चक्र भी हैं। वे ही प्रकृति और पुरुष भी हैं। हम सब शून्य से नहीं आते। शून्य में नहीं जाते। शून्य कुछ होता भी नहीं। प्रकृति सदा से है। हम प्रकृति से उगते हैं, प्रकृति में पलते हैं। उसके पहले गर्भ में होते हैं। गर्भ में सूर्य चंद्र है नहीं। गर्भ में शुक्लपक्ष नहीं होते। कृष्ण पक्ष ही वास्तविकता है। कृष्णायन से ही आए हैं हम सब। श्रीकृष्ण हमारा उत्स, स्रोत और गोत्र हैं। इसलिए श्रीकृष्ण होना सबकी संभावना है। श्रीकृष्ण होने की संभावना हमारे व्यक्तित्व में पहले से ही है। हमारे गुण-सूत्र जीन्स में ही। श्रीकृष्ण हमारे भीतर ‘इन बिल्ट’ हैं। बस इसी तन्त्र का स्विच बटन खोजना है। लेकिन यह स्विच बटन जीवन की संपूर्णता में ही दबता है। संपूर्ण तब संपूर्ण हो जाता है-नृत्यमगनता, भयंकर क्रोध और शांति की प्यास के अन्तराल में। रसप्रियत्व की असारता में। अति आकुल व्याकुल प्रेम भक्ति विह्वलता में या शरद् पूनों के चंद्र में।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
