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यूपी भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों की सूची प्रकाशन के लिए तैयार! कइयों की हुई छुट्टी!

-अगले 72 घंटे यूपी भाजपा के लिए अहम!

मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ

यूपी भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी प्रकाशन के लिए तैयार हो गई है। सूत्रों के अनुसार, सूची में एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने अपना दबदबा साबित किया है। अपने क्षेत्र के अलावा प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी हर पद के लिए न्यूनतम तीन-तीन लोगों की अनुशंसा की है। जो भी चयनित होगा, उसे उनका समर्थन प्राप्त माना जाएगा।
आजादी के बाद से ही गांधी विरोधी होने का आरोप झेल रहे डॉ. हेडगेवार के अनुयायियों ने इस बार महात्मा गांधी का भी सम्मान किया है। सबसे अधिक छंटनी प्रदेश महामंत्री और उपाध्यक्ष पदों पर हुई है। लखनऊ के एक वरिष्ठ नेता की घेरेबंदी की कोशिश में भी कोई कमी नहीं छोड़ी गई। परिणाम कुछ भी हो, लेकिन कुछ लोगों को यह कोशिश भारी पड़ सकती है।
प्रदेश मंत्रियों के लिए यह टीम नई उम्मीद लेकर आई है। पिछली टीम में गोरखपुर क्षेत्र के संतकबीरनगर का जो प्रभाव था, बताया जा रहा है कि इस टीम में उसे ढूंढना मुश्किल होगा। प्रदेश के पौने तीन करोड़ सदस्यों वाली पार्टी में 35 लोगों का चयन बड़ा कार्य था। टीम चयन की माथापच्ची ने जिम्मेदारों को काफी सिरदर्द दिया। ऐसे में कार्यकारिणी घोषित होने के बाद ही जरूरतमंद और जिम्मेदार, दोनों को राहत मिलेगी।
सूत्रों के इनपुट के आधार पर कई स्तरों पर जानकारी जुटाने की कोशिश की गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वे दो उपाध्यक्ष और दो महामंत्री कौन हैं, जो अपने पद बचाने में सफल रहे हैं। मीडिया टीम के दो सदस्यों को भी नई टीम में स्थान मिला है।
चुनाव न लड़ने की शर्त पर एक संघर्षशील नेता को प्रदेश टीम में महत्वपूर्ण पद दिया गया है, जिन्हें अपनी टीम में जगह न देने के लिए पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह ने काफी प्रयास किए थे। कार्यकर्ता भाव वाले इस विनम्र नेता की लोकप्रियता पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह बनी हुई है।
इस बात की दिल्ली तक चर्चा है कि इस बार अपने जिले के संगठन पर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसा प्रभाव रखने वाले विद्यार्थी परिषद के पूर्व संगठन मंत्री ने भी कई लोगों की रणनीति प्रभावित कर दी है। उन्होंने अपने समर्थकों को प्रदेश टीम में स्थान दिलाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई है। समर्थकों के लिए उन्होंने एक ओर नितिन नवीन से तर्कसंगत चर्चा की तो दूसरी ओर विनोद तावड़े के साथ भी समन्वय स्थापित किया।
हालांकि, वास्तविक स्थिति सूची जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। प्रामाणिक जानकारी सामने नहीं आती, इसलिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं को सावधानीपूर्वक जोड़ना पड़ता है।
उत्तर प्रदेश ऐसा पहला राज्य है, जिसकी संगठनात्मक सूची प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की सहमति के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन तथा राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बी.एल. संतोष के मार्गदर्शन में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और प्रदेश महामंत्री संगठन द्वारा घोषित की जाएगी।
प्रॉपर्टी के काम से जुड़े एक व्यक्ति को हटाया गया है, तो दूसरे नए व्यक्ति को जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव मुख्य रूप से मीडिया विभाग तक सीमित बताया जा रहा है। दलित समाज से अनुभवी और युवा, दोनों वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस बार मीडिया टीम में प्रखर और ओजस्वी पिछड़े एवं दलित चेहरे देखने को मिलेंगे। महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है।
इस बार की सूची संभावित पदाधिकारियों से ज्यादा उनके पक्ष में खुलकर पैरवी करने वालों की वजह से चर्चा में रही। अपने-अपने पसंदीदा और योग्य कार्यकर्ताओं के समर्थन में दिग्गज नेताओं ने पूरी ताकत लगा दी। किसी के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर के नेता सक्रिय रहे तो किसी के समर्थन में पूर्णकालिक संगठन कार्यकर्ताओं ने भूमिका निभाई।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले कई लोगों को भी पद मिले हैं, लेकिन इसका असर सीमित बताया जा रहा है। वर्तमान टीम के एक महामंत्री, जिन्हें टोल गेट के नाम से संबोधित किया जाता है, उनके प्रभाव वाले कुछ क्षेत्रीय अध्यक्ष भी प्रदेश टीम में जगह बनाने में सफल रहे हैं। जिन लोगों को पदमुक्त किया गया है, उन्हें भी पार्टी समान स्तर की नई जिम्मेदारियां सौंप सकती है।
क्षेत्रीय अध्यक्ष की दौड़ में शामिल दो नेता गोरखपुर के कई दौरे कर चुके हैं। लखनऊ में मिले आशीर्वाद के बावजूद उन्हें पूरी तरह संतोष नहीं मिल पाया था। वैसे भी नए दौर में बिना पक्के आश्वासन के कुछ लोग संतुष्ट नहीं होते।
दो पूर्व जिलाध्यक्ष नागपुर से अपने पक्ष में समर्थन हासिल करने में सफल रहे, लेकिन संघ से भाजपा में आए एक पूर्व प्रचारक को अंतिम समय में नुकसान उठाना पड़ रहा है। गोरखपुर के बाद सबसे अधिक प्रतिस्पर्धा पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष पद को लेकर रही है। अवध क्षेत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी सक्रिय भूमिका निभानी पड़ी, तब जाकर उनकी पसंद का क्षेत्रीय अध्यक्ष तय हो सका।
सूत्रों का दावा है कि अगले 72 घंटे यूपी भाजपा के लिए बेहद अहम हैं। पूरी सूची एक साथ जारी होने की संभावना है। पार्टी पदाधिकारी, क्षेत्रीय अध्यक्ष, मोर्चा अध्यक्ष और प्रकोष्ठों के संयोजकों की घोषणा एक साथ हो सकती है।
जो भी टीम बनेगी, उसके सभी नए पदाधिकारी पहले दिन से ही विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में जुट जाएंगे। संगठन को मजबूत करना और 2027 में सरकार बनाना प्राथमिक लक्ष्य होगा। उसके बाद ही बधाई और उत्सव का दौर शुरू होगा।

चलते-चलते…
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए समय अब बहुत कम बचा है। इसलिए सरकार और संगठन दोनों चुनावी मोड में आ गए हैं। राजनीतिक रूप से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य में पिछले तीन वर्षों से कोई स्थायी प्रदेश प्रभारी नहीं रहा। लोकसभा चुनाव में प्रदेश प्रभारी बनाए गए बैजयंत पंडा स्वयं ओडिशा से चुनाव लड़ रहे थे।
प्रदेश में टिकट वितरण में निर्णायक भूमिका निभाने वाले तत्कालीन प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल वाराणसी में केंद्रित रहे, जिससे चुनावी रणनीति प्रभावित हुई। यदि टिकट वितरण के बाद उन्होंने प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर अधिक समय दिया होता, तो भाजपा 2024 की बड़ी हार से काफी हद तक बच सकती थी।
पिछले एक वर्ष से निवर्तमान अध्यक्ष मंत्री बनने के प्रयासों में सक्रिय रहे। इसके बावजूद यूपी भाजपा ने अधिकांश अभियानों में सफलता हासिल की और सदस्यता के नए रिकॉर्ड बनाए। इसके बाद विनोद तावड़े जैसे प्रभारी मिले, जो प्रदेश से बाहर रहकर भी उत्तर प्रदेश का संगठन संभाल रहे हैं।
फिलहाल कार्यकर्ता नई ऊर्जा के साथ 2027 के चुनाव की तैयारी में जुटे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा विधायकों से मंडलवार बैठकें तेज कर रहे हैं। विधायकों की शिकायतों के समाधान के लिए शासन स्तर पर अधिकारियों को भौतिक सत्यापन के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि, अधिकारियों पर नियंत्रण को लेकर जारी निर्देशों का असर सीमित दिखाई दे रहा है। नौ वर्षों से चली आ रही व्यवस्थागत चुनौतियों के समाधान के लिए व्यापक सुधारों की आवश्यकता है। जिस व्यवस्था में मंत्री अधिकारियों को खुश करने में लगे हों और विधायक अफसरों के सामने झुकते हों, वहां स्वाभिमानी नेतृत्व तैयार करना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।
इसके बावजूद जो नेता कार्यकर्ताओं की समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके पास आज भी कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटती है। यही विश्वास और उम्मीद उनके लिए आगे बढ़ने की सबसे बड़ी ऊर्जा बनी हुई है।

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