-७७ प्रतिशत को घटाकर करना था ६७ प्रतिशत
-आयात बढ़कर जा पहुंचा ८७ प्रतिशत पर
सामना संवाददाता / मुंबई
कच्चे तेल का आयात कम करने के लिए मार्च २०१५ के ‘ऊर्जा संगम’ सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक लक्ष्य निर्धारित किया था। उन्होंने तब कहा था कि भारत को २०२२ तक कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता १० प्रतिशत घटानी चाहिए। उस समय भारत अपनी तेल जरूरतों का करीब ७७ फीसदी आयात करता था। लक्ष्य यह था कि २०२२ तक इसे करीब ६७ फीसदी पर लाया जाए। आगे २०३० तक निर्भरता को और घटाकर लगभग आधा करने की बात भी कही गई थी। मोदी का आशय यह था कि देश अपनी जरूरत का अधिक तेल और गैस खुद पैदा करे, वैकल्पिक र्इंधन बढ़ाए और आयात बिल घटाए। मगर हुआ उल्टा। आयात लक्ष्य कम निर्धारित करने के बावजूद आयात बढ़ता चला गया।
वैकल्पिक ऊर्जा की बातें रहीं हवा-हवाई!
मोदी सरकार बार-बार कच्चे तेल के आयात में कमी करने की हवा-हवाई बातें करती रही है। २०१५ में ऊर्जा संगम में पहली बार बड़ा लक्ष्य दिया गया, २०२२ तक तेल आयात निर्भरता १० फीसदी कम करनी है। इसके बाद पेट्रोलियम मंत्रालय और तत्कालीन मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बार-बार कहा कि सरकार घरेलू तेल-गैस उत्पादन, जैव र्इंधन और एथेनॉल मिश्रण के जरिए आयात घटाने पर काम कर रही है। नवंबर २०१९ में भी यह दावा किया गया कि भारत २०२२ तक आयात निर्भरता १० फीसदी घटाने की दिशा में बढ़ रहा है।
सरकार ने कच्चे तेल की जगह वैकल्पिक ऊर्जा, एथेनॉल ब्लेंडिंग, सीबीजी, बायोडीजल, इलेक्ट्रिक वाहन, गैस आधारित अर्थव्यवस्था और ऊर्जा दक्षता को आयात निर्भरता घटाने की रणनीति बताया। पीआईबी के अनुसार, सरकार ने ‘मल्टी प्रॉन्गड स्ट्रेटजी’ अपनाने की बात कही, जिसमें प्राकृतिक गैस, एथेनॉल, कंप्रेस्ड बायोगैस, बायोडीजल, ईवी चार्जिंग और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की नीतियां शामिल हैं।
हकीकत क्या रही?
लक्ष्य था निर्भरता घटाना, लेकिन आंकड़े उल्टी दिशा दिखाते हैं। २०१३-१४ के आसपास आयात निर्भरता करीब ७७.६ फीसदी थी। पीपीएसी के आंकड़ों के आधार पर २०२३-२४ में यह बढ़कर ८७.७ फीसदी तक पहुंच गई। २०२४-२५ में भी भारत ने २४३.२२५ मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन सिर्फ २८.७ मिलियन टन रहा। संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कच्चे तेल का आयात बढ़ा और घरेलू उत्पादन कमजोर रहा।
