हिमांशु राज
उत्तर प्रदेश की सियासी-धार्मिक रंगभूमि पर बाबा बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और सपा नेता अखिलेश यादव के बीच तीखा `वर्ड’ वॉर जारी है। इटावा में यादव कथावाचकों के साथ हुई जातिगत हिंसा और बाबा पर `अंडर-टेबल फीस’ के आरोपों से उपजे इस संघर्ष में दोनों ने व्यंग्य के तीखे तीर चलाए हैं। बाबा ने अखिलेश को संदर्भित करते हुए कहा, `जो नेता वोट की पूजा में `सामाजिक न्याय’ का भजन गाते हैं, उनकी राजनीतिक कथा भक्ति नहीं, समाज को विभाजित करने का मंत्र सुनाती है। इटावा का हारमोनियम तो उनकी चुनावी रणनीति का प्रतीक मात्र है!’ इस टिप्पणी में उन्होंने अखिलेश के ओबीसी समर्थन को राजनीतिक अवसरवाद बताने का संकेत दिया।
इस पर अखिलेश ने तीक्ष्ण प्रत्युत्तर देते हुए कहा, `जिन बाबाओं के `दिव्य दरबार’ में गरीब की भागीदारी `दिव्य दान’ के आंकड़े से तौली जाती है, उनकी `हिंदू एकता’ केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित है। क्या उनकी आध्यात्मिक दृष्टि यह नहीं देख पाती कि जिस मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा आता है, वहां दलित पुजारी की प्रतीक्षा अगले जन्म तक के लिए स्थगित है?’ उन्होंने धार्मिक आयोजनों को `जातीय व्यवसाय मॉडल’ की संज्ञा देते हुए बाबा को उसका प्रतीक बताया। इस संवाद में दोनों ने एक-दूसरे के रुख में विरोधाभास की ओर इशारा किया। बाबा अखिलेश की राजनीति को `वोटबैंक की कथा’ कहते हैं, जो सामाजिक एकता के स्थान पर विभाजन को बढ़ावा देती है। अखिलेश बाबा के आध्यात्मिक दावों के पीछे `जातीय पूर्वाग्रह’ का प्रश्न खड़ा करते हैं। जहां बाबा `राजनीतिक रोटियां सेंकने’ का आरोप लगाते हैं, वहीं अखिलेश `अंडर-टेबल आर्थिक व्यवस्था’ के मुद्दे को उछालते हैं। यह टकराव दो विपरीत विचारधाराओं का प्रतिबिंब है: एक ओर जाति-निरपेक्ष धार्मिक पहचान का दावा, तो दूसरी ओर धार्मिक क्षेत्र में सामाजिक समावेश की मांग। २०२७ के चुनाव की पृष्ठभूमि में यह संघर्ष और तीव्र हुआ है। बाबा हिंदू समाज को सामूहिक सूत्र में बांधने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि अखिलेश ओबीसी वोटों को सपा से जोड़ने की रणनीति पर कार्यरत हैं। परंतु दोनों इस सत्य से परिचित हैं कि उत्तर प्रदेश में धर्म और राजनीति की सीमाएं अब धुंधली हो चुकी हैं। जहां बाबा के आश्रम में सियासी प्रभाव की गूंज सुनाई देती है, वहीं अखिलेश के रैली मंचों पर धार्मिक प्रतीकों की छाया दिखती है। यह विवाद सिद्ध करता है कि भारतीय समाज में धर्म और राजनीति अब अलग-अलग धाराएं नहीं, बल्कि एक ही स्रोत की सहचरी धाराएं बन गई हैं।
