मनमोहन सिंह
`राम तेरी गंगा मैली हो गई…’ दशकों पुराना यह फिल्मी गीत आज सिर्फ एक सिनेमाई पंक्ति नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक लापरवाही, प्रशासनिक नाकामी और पर्यावरण के प्रति संवेदनहीनता का सबसे कड़वा सच बन चुका है। वैज्ञानिक आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट्स यह साफ इशारा कर रहे हैं कि गंगा के मैदानों से लेकर हिमालय की ऊंची चोटियों तक संकट के काले बादल मंडरा रहे हैं। ये ताजा आंकड़े पर्यावरणविदों के साथ-साथ आम जनता की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी हैं।
गंगा सिर्फ एक पवित्र नदी नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा, संस्कृति, इतिहास और लगभग ५० करोड़ से अधिक आबादी की आजीविका का मुख्य आधार है। लेकिन आज इस जीवनदायिनी का अस्तित्व ही खतरे में है। संकट का दायरा अब केवल शहरों के घाटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समस्या इसके उद्गम स्थल तक पहुंच चुकी है।
उत्तराखंड की शांत और पवित्र पहाड़ियों से उतरकर गंगा जब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के घने मैदानी इलाकों से गुजरती है तो इसका स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। इन मैदानी क्षेत्रों में रोजाना करोड़ों लीटर बिना साफ किया हुआ सीवेज, प्लास्टिक कचरा और उद्योगों से निकलने वाला जहरीला केमिकल सीधे नदी में बहा दिया जाता है। जिस जल को लोग मोक्षदायिनी मानकर आचमन करते थे, वह आज छूने लायक भी नहीं बचा है।
शोध बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग और इंसानी दखल के कारण हिमालय के ग्लेशियर रिकॉर्ड रफ्तार से पिघल रहे हैं। ब्लैक कार्बन और प्लास्टिक के बारीक कण, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, अब पहाड़ों की बर्फीली चोटियों और गंगोत्री जैसे पवित्र उद्गम स्थलों पर पाए जा रहे हैं। यदि ग्लेशियर इसी गति से पिघलते रहे, तो आने वाले समय में गंगा में पानी का संकट खड़ा हो जाएगा, जो पूरे उत्तर भारत में सूखे और अकाल का कारण बन सकता है। इस प्रदूषण का सीधा असर नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे गंगा की पहचान मानी जाने वाली `गंगा डॉल्फिन’ और अन्य दुर्लभ जलीय जीव तेजी से विलुप्त हो रहे हैं।
समय तेजी से हाथ से निकल रहा है। यदि हमने अब भी अपनी इस जीवनदायिनी नदी को बचाने के लिए ठोस और कड़े कदम नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा सिर्फ इतिहास के पन्नों, धार्मिक ग्रंथों और पुरानी तस्वीरों में सिमट कर रह जाएगी। गंगा का सूखना या प्रदूषित होना सिर्फ एक नदी का अंत नहीं होगा, बल्कि यह भारत की एक समृद्ध सभ्यता और संस्कृति का अंत होगा।
