श्रीकिशोर शाही
(सत्ता में सुंदरी की घुसपैठ-अंतिम)
न्यूयॉर्क और पेरिस में फोटोग्राफी की कठोर ट्रेनिंग के बाद पामेला बोर्डेस अब एक मुकम्मल फोटो जर्नलिस्ट बन चुकी थी। लेकिन एक चीज की कमी अभी भी थी, उसकी असली पहचान। जिस फ्रांसीसी उपनाम ने उसे शोहरत की बुलंदियों और बदनामी की गहरी खाइयों तक पहुंचाया था, अब उसका कोई मोल नहीं रह गया था। अपने अतीत को पूरी तरह दफन करते हुए उसने ‘बोर्डेस’ उपनाम हमेशा के लिए त्याग दिया। उसने वापस अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए अपने असली नाम को गले लगाया। वह पामेला बोर्डेस से फिर पामेला सिंह हो गई।
यह केवल नाम की वापसी नहीं थी, यह उसकी अपनी आत्मा की वापसी थी। पामेला सिंह अब हिंदुस्थान लौट आई। लेकिन यह वह हिंदुस्थान नहीं था, जिसे वह ‘मिस इंडिया’ बनकर पीछे छोड़ गई थी, न ही वह खुद अब वैसी रह गई थी। उसने चकाचौंध भरे महानगरों से दूर, गोवा की शांति को अपना नया ठिकाना बनाया। वैâमरे को अपना सच्चा साथी बनाकर पामेला दुनिया भर के उन कोनों में गई, जहां जाने की हिम्मत शायद ही कोई करता। कंबोडिया के युद्धग्रस्त इलाकों से लेकर अप्रâीका की सुदूर जनजातियों तक और हिंदुस्थान के रहस्यमयी नागा साधुओं से लेकर कुंभ मेले के रंगीन दृश्यों तक, उसकी तस्वीरों ने एक अलग ही दुनिया पेश की।
पामेला सिंह द्वारा खींची तस्वीरें अब मैरी क्लेयर, द इंडिपेंडेंट और संडे टाइम्स जैसी दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगीं। यह वही ‘संडे टाइम्स’ था जिसके संपादक कभी उसके हुस्न के दीवाने हुआ करते थे। उसकी तस्वीरों की प्रदर्शनियां लंदन और न्यूयॉर्क की नामी गैलरियों में लगीं और दुनिया ने एक बेहतरीन फोटो जर्नलिस्ट के रूप में उसका लोहा माना।
पामेला की कहानी किसी अचरज से कम नहीं है। एक फौजी की बेटी, जो ग्लैमर की चाह में दुनिया की सबसे कुख्यात महिला बन गई और फिर जिसने अपनी कला के दम पर खुद को एक सम्मानित मुकाम तक पहुंचाया। पामेला की कहानी पतन और वापसी का एक ऐसा बेजोड़ उदाहरण है, जो यह साबित करती है कि इंसान की असली ताकत उसके रूप में नहीं, बल्कि उसके कभी न हार मानने वाले जज्बे में छिपी होती है। आज पामेला चकाचौंध और विवादों से मीलों दूर, वैâमरे के पीछे अपना एक शांत और मुकम्मल जीवन जी रही है।
(समाप्त)
