मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का :  मंदिर का खजाना

तड़का :  मंदिर का खजाना

कविता श्रीवास्तव

‘कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।।’
कबीर के इस दोहे का अभिप्राय है कि ऐसा धन बचाओ जो भविष्य में काम आए, कोई भी व्यक्ति सिर पर पोटली बांधकर धन ले जाते हुए नहीं देखा गया। भगवद् गीता में कहा गया है कि भौतिकवादी लोग केवल धन कमाने व जमा करने, ऐश्वर्य और श्रेष्ठता हासिल करने और विख्यात होने की सोचते हैं। ऐसी सोच वालों को इस खबर को समझना चाहिए कि वृंदावन के सबसे प्रतिष्ठित बांकेबिहारी मंदिर का खजाना ‘तोषखाना’ ५४ साल बाद जब हाल ही में खोला गया तो उसमें मिट्टी, धूल और सांपों के अलावा पीतल-कांसे के बर्तन, चांदी की छड़ें और सोने की एक छड़ी ही मिली और खाली बक्से भी पाए गए। खजाने की जगह पर रखे गए हजारों करोड़ के हीरे और जवाहरात होने की बातें निराधार निकलीं। इस मंदिर के खजाने में १९२६ और १९३६ में चोरी हुई थी। १९७१ में खजाना बंद कर दिया गया था। लेकिन इन सारी बातों से बांकेबिहारी मंदिर का महत्व कभी प्रभावित नहीं हुआ। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्तों के भाव में कभी कोई कमी नहीं आई। आज भी वृंदावन धाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को इस मंदिर का दर्शन कृष्ण की भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में बांकेबिहारी के दर्शन के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं को इससे कोई मतलब नहीं है कि वहां के खजाने में क्या है और क्या नहीं है। खजाना है भी या नहीं। वे भगवान के आशीर्वाद का खजाना ढूंढते हैं। मन की संतुष्टि का खजाना भरते हैं और श्रद्धा भाव से लौट जाते हैं। भगवान कुछ नहीं लेते हैं फिर भी भगवान को चढ़ावा अर्पण करने की परंपरा है। कहते हैं न ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा…।’ इसका एक अभिप्राय यह है कि हम भगवान को जो कुछ भी अर्पित करते हैं वह भगवान का ही दिया हुआ है। दूसरा अभिप्राय यह है कि भगवान के समक्ष जो भी वस्तु रखी जाती है, उसमें से भगवान तनिक मात्र भी नहीं लेते हैं। वह पुन: भक्त के पास ही लौट आती है। फिर भी देश के कई मंदिरों में अपार धन आता है। इस धन का कई जगह धर्मादा कार्यों में उपयोग हो रहा है। गरीबों के मुफ्त इलाज, बच्चों की पढ़ाई, गरीब कन्याओं के विवाह, बुजुर्गों को अनुदान जैसे अनेक उपक्रम कई मंदिरों के ट्रस्ट से चलते हैं। बांकेबिहारी मंदिर को लेकर कहा जाता है कि पुराने जमाने के राजाओं, महाराजाओं ने भगवान के लिए छत्र-आभूषणों सहित अनेक कीमती सामग्रियां भेंट की थीं। वह चोरी हो गर्इं। मंदिरों का खजाना श्रद्धालुओं के चढ़ावे से ही भरता है। दर्शन-पूजन आदि के साथ मनौती पूरी होने पर अथवा श्रद्धा भाव से भी श्रद्धालु चढ़ावा अर्पण करते हैं। लेकिन कुछ कुदृष्टि भी रहती है। तभी तो मंदिर के बाहर भक्तों के जूते-चप्पल भी चोरी हो जाते हैं। इसके बाद भी मंदिरों से पुण्य का खजाना कभी कम नहीं होता है।

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मन पाखी