मुख्यपृष्ठनए समाचाररुख-ए-सियासत : राम के नाम पर जमीन, जमीर और जिम्मेदारी

रुख-ए-सियासत : राम के नाम पर जमीन, जमीर और जिम्मेदारी

तौसीफ कुरैशी

अयोध्या केवल एक शहर नहीं है। वह करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए अयोध्या से जुड़ा हर सवाल राजनीति से पहले नैतिकता का सवाल बन जाता है। अगर किसी मंदिर के चढ़ावे, दान या ट्रस्ट के कामकाज को लेकर गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो उन्हें केवल आरोप कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा दायित्व पारदर्शिता का होता है। हाल के दिनों में राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े दान और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर सवाल उठे हैं। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच से ही हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही एक और मांग भी तेज होती दिखाई दे रही है कि वर्ष २०१९ से २०२६ के बीच अयोध्या और मंदिर परिसर के आसपास हुई जमीनों की खरीद-फरोख्त की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह मांग इसलिए भी उठ रही है क्योंकि मंदिर निर्माण की घोषणा के बाद अयोध्या की जमीनों के दाम कई गुना बढ़ गए। करोड़ों रुपए के सौदे हुए।
अनेक रिपोर्टों और सार्वजनिक चर्चाओं में पहले भी आरोप लगे कि कुछ जमीनें कम कीमत पर खरीदी गर्इं और घंटों के बाद ही कई गुना अधिक कीमत पर बेची गर्इं। उन आरोपों पर उस समय भी सवाल उठे थे, लेकिन व्यापक और सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य जांच का अभाव बना रहा। लोकतंत्र में संदेह का समाधान भाषणों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों से होता है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जांच से सबसे अधिक लाभ उन्हीं लोगों को होगा, जिन पर आरोप लगाए जा रहे हैं। क्योंकि पारदर्शिता आरोपों को समाप्त करती है, जबकि जांच से बचने की कोशिश संदेह को और गहरा करती है। आज अयोध्या में यह चर्चा भी सुनाई देती है कि किसे कौन-सी जमीन मिली, किसे नहीं मिली और किन लोगों को विशेष लाभ पहुंचा। ऐसे दावों में कुछ नाम भी लिए जाते है। इन दावों की पुष्टि स्वतंत्र जांच के बिना नहीं की जा सकती, इसलिए इन्हें तथ्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि समाज में इस स्तर की शंकाएं पैदा हो गई हैं, तो उन्हें दूर करना भी संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। राम मंदिर किसी व्यक्ति, किसी संगठन या किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है जैसा दर्शाया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन ही मालिक हैं। यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। इसलिए उसके आसपास होने वाला हर आर्थिक निर्णय भी सार्वजनिक विश्वास की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
जनता का विश्वास ही सबसे बड़ी अदालत
लोकतंत्र में सबसे बड़ी अदालत जनता का विश्वास होता है। अदालत का पैâसला बाद में आता है, लेकिन जनता का भरोसा एक बार टूट जाए तो उसे वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। यही बात धार्मिक संस्थाओं पर भी लागू होती है। मंदिर केवल पत्थरों से नहीं बनते, वे विश्वास से बनते हैं और विश्वास की नींव ईमानदारी होती है। यदि किसी ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर आरोप लगते हैं, तो उनका सबसे मजबूत उत्तर जांच में सहयोग करना होना चाहिए। अगर जांच में सब कुछ सही निकलता है तो आरोप लगाने वालों की विश्वसनीयता समाप्त होगी। लेकिन यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं, तो दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यही न्याय है और यही धर्म भी, लेकिन सत्ता का अहंकार उसे भुला देता है और सत्ता के अहंकार पर बने महल दरकना शुरू हो जाते है। जबकि सत्ता के अहंकार को इसका अहसास ही नहीं होता कि महल दरकना शुरू हो गया है और वह भरभराकर ढह जाता है।
जनता देती भी है और हिसाब भी लेती है
जनता की धार्मिक भावनाओं से खेलकर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे लोग भूल रहे हैं कि जनता जैसे लाती वैसे ही भेज भी देती है, लेकिन विश्वास खो देने पर ऐसे दलों, संगठनों या व्यक्तियों को सदियों पीछे धकेल दिए जाता है, इसको भी ध्यान रखना चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि राम का नाम भारतीय समाज में न्याय, मर्यादा और सत्य का प्रतीक है। इसलिए राम के नाम पर बनी किसी भी संस्था से अपेक्षाएं सामान्य संस्थाओं से कहीं अधिक होंगी। वहां केवल कानूनी शुचिता नहीं, नैतिक शुचिता भी अपेक्षित है। देश ने मंदिर निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दिया। अनेक लोगों ने अपनी सामर्थ्य से अधिक योगदान किया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि उनका धन एक पवित्र उद्देश्य में लगेगा। उस विश्वास की रक्षा करना केवल ट्रस्ट का प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक धर्म भी है।
आस्था को सबसे बड़ा खतरा सवालों से नहीं, बल्कि सवालों से बचने की प्रवृत्ति से होता है। यदि सब कुछ पारदर्शी है तो जांच से डर वैâसा? और यदि कहीं गलती हुई है तो उसे छिपाना राम के आदर्शों के साथ न्याय नहीं होगा। अंतत: प्रश्न केवल ज़मीन का नहीं है। प्रश्न उस विश्वास का है जिसे करोड़ों लोगों ने अपने हाथों से बनाया है। उस विश्वास की रक्षा का एक ही रास्ता है सत्य, पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच। यही राम की मर्यादा है और यही लोकतंत्र की भी। जांच तो होगी यह सरकार या प्रशासन भले ही आनाकानी कर ले, लेकिन भविष्य की सरकार और प्रशासन इसकी निष्पक्ष जांच जरूर कराएगा, इसको भी ध्यान रखना चाहिए। अब बच या बचाया जा सकता है जैसा दिख रहा है, लेकिन भविष्य में भी बचे रहेंगे, यह समझना मूर्खता होगी। हर हर…घर घर…।
सत्य जल्द सामने आएगा
यदि आज यह मांग उठ रही है कि २०१९ से २०२६ तक मंदिर परिसर और उसके आसपास हुई सभी प्रमुख भूमि खरीद-फरोख्त, ट्रस्ट के वित्तीय निर्णयों और संबंधित प्रक्रियाओं की स्वतंत्र तथा निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो इसे लोकतांत्रिक प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। जांच से सत्य सामने आएगा, चाहे वह आरोपों को गलत साबित करे या सही। राम का नाम आस्था का विषय है।

सत्यमेव जयते

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