प्रणव प्रियदर्शी
आज चार मई को जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में पड़े मतों की गिनती शुरू हो चुकी है, सबका ध्यान इस बात पर लगा है कि किस राज्य में कौन सत्ता में आता, सत्ता बचाता या सत्ता से बाहर जाता है। लेकिन नतीजे जो भी हों, उनसे राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों में तत्काल कोई निर्णायक बदलाव नहीं आनेवाला। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष-इन चुनावी मुकाबलों से मनोबल में हुई थोड़ी-बहुत घट-बढ़ के बावजूद उन्हें लोहा एक-दूसरे से ही लेना है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन चुनावी मुकाबलों ने किस पर किस तरह का प्रभाव डाला है।
खास प्रभाव नहीं
जहां तक बीजेपी की बात है तो उसकी स्थिति और रणनीति पर इन चुनाव नतीजों का कोई खास प्रभाव पड़ता नहीं दिखता। असम उसके पास बना रहा और पश्चिम बंगाल की सत्ता मिल गई तो निश्चित रूप से उसका मनोबल बहुत बढ़ जाएगा। ऐसा न हो सका, तो यह उसके लिए एक झटका होगा, लेकिन इससे उसकी राजनीति की शैली पर कोई प्रभाव पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता। बात चाहे पीएम मोदी को मुख्य चेहरा बना कर चुनाव लड़ने की हो या कथित तौर पर चुनाव आयोग के इस्तेमाल की, विपक्ष के आरोपों का अपने रुख पर कोई प्रभाव वह नहीं पड़ने देना चाहेगी।
दिख गई दूरी
विपक्षी पार्टियों की बात करें तो इन चुनावों ने सत्ता पक्ष से उनके संबंधों को ही नहीं, उनके आपसी समीकरणों को भी प्रभावित किया है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से ममता बनर्जी बीजेपी विरोधी राजनीति के पूरे स्पेस को कवर करती नजर आईं और केरल में जिस तरह से कांग्रेस ने वाम मोर्चा सरकार को फासीवादी तक करार दिया, उससे विपक्षी एकता को लेकर कोई पॉजिटिव संदेश नहीं गया है। हालांकि, ये चुनावी तेवर थे और इनका संदर्भ पूरी तरह प्रादेशिक था। फिर भी इंडिया ब्लॉक को यह सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर उसके विभिन्न धड़ों में दूरी बढ़ी हुई न दिखे। यह भी तय है कि विश्लेषकों का एक धड़ा चुनाव नतीजों की व्याख्या करते हुए इस दूरी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की खास तौर पर कोशिश करेगा।
बैठक की कवायद
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि चुनाव नतीजे घोषित होने से पहले ही इंडिया ब्लॉक के दलों की एक बड़ी बैठक बुलाने की कवायद शुरू हो गई है। कहा जा रहा है कि मई के मध्य में होने वाली इस बैठक में चुनाव नतीजों पर नहीं, उन मुद्दों पर मंथन होगा जो समूचे विपक्ष की साझा चिंता को जाहिर करते हैं। ध्यान रहे, इन चुनावों के दौरान इंडिया ब्लॉक के दलों के आपसी मतभेद ही नहीं दिखे, बहुत कुछ ऐसा भी रहा जो उनकी एकजुटता को रेखांकित करता है, उसे मजबूती दे सकता है। मिसाल के तौर पर ऐन चुनावों के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिला आरक्षण बिल पेश करना। सरकार ने यह चाल बहुत सोच-समझ कर चली थी, लेकिन विपक्ष ने बेहतरीन तालमेल और एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए उसे सफलतापूर्वक गिरा दिया।
साझा संघर्ष की संभावना
मतदाताओं पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच चले इस घात-प्रतिघात का कितना और वैâसा असर पड़ा, यह अलग बात है, संसद के मंच पर तो विपक्ष ने अपनी जीत दर्ज करा ही दी। इससे यह भी साबित हुआ कि परिसीमन का मुद्दा इंडिया ब्लॉक को जोड़े रखनेवाले सीमेंट का काम कर सकता है। साफ है कि विपक्ष की पार्टियां परिसीमन के मसले को और जोर-शोर से उठाते हुए उसे महिला आरक्षण के आवरण से बाहर निकालेंगी और उस पर साझा संघर्ष की संभावनाओं को मजबूती देंगी।
एकता की धुरी
ऐसे ही चुनाव आयोग की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका विपक्षी एकता की एक और धुरी साबित हो सकती है। ध्यान रहे मुख्य चुनाव आय़ुक्त को पद से हटाने के लिए विपक्षी दल २४ अप्रैल को राज्यसभा में एक और नोटिस दे चुके हैं। पिछले नोटिस को तो राज्यसभा सभापति ने बगैर कोई कारण बताए खारिज कर दिया, लेकिन वह मुद्दा तब चुनावी गहमागहमी में दब गया था। विपक्षी दल इस बार इस मुद्दे को उतनी आसानी से दफन नहीं होने देना चाहेंगे।
जटिल सवाल
हालांकि, चुनाव आयोग के कथित पक्षपातपूर्ण व्यवहार और चुनावों में धांधली के अपने आरोपों पर विपक्षी दलों का रुख कितना गंभीर होना चाहिए और उस पर किस हद तक आगे बढ़ना चाहिए, यह एक जटिल सवाल है। विभिन्न दलों का रुख भी इस पर अलग-अलग रहा है। लेकिन अब इस सवाल को और टाला नहीं जा सकता। संभव है कि इंडिया ब्लॉक आनेवाले दिनों में इस पर और स्पष्टता लाने का प्रयास करे।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
