मुख्यपृष्ठस्तंभट्रंप को ‘सुपर एयरफोर्स वन’ हम पुराने जगुआर कलपुर्जों को मोहताज

ट्रंप को ‘सुपर एयरफोर्स वन’ हम पुराने जगुआर कलपुर्जों को मोहताज

दुनिया आधुनिक लड़ाकू विमान जुटा रही, भारत को सेवानिवृत्त विमानों से बचाना पड़ रहा अपना बूढ़ा बेड़ा

एक ओर अमेरिका ने कतर से मिले करीब ४० करोड़ डॉलर मूल्य के अत्याधुनिक बोइंग ७४७-८ विमान को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए अस्थायी ‘एयरफोर्स वन’ के रूप में तैयार कर लिया है, वहीं दूसरी ओर भारत अपनी वायुसेना के पुराने जगुआर लड़ाकू विमानों को उड़ान योग्य बनाए रखने के लिए ब्रिटेन के नौ सेवानिवृत्त विमान लेने जा रहा है। दोनों घटनाओं की सीधी तुलना तकनीकी रूप से पूरी तरह समान नहीं है। अमेरिकी विमान राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा के लिए है, जबकि ब्रिटेन से लिए जाने वाले जगुआर विमानों का उपयोग युद्धक विमान के रूप में नहीं, बल्कि स्पेयर पार्ट्स और सब-असेंबली निकालने के लिए किया जाएगा। इसके बावजूद यह तस्वीर भारत की लड़ाकू विमान क्षमता, रक्षा खरीद की धीमी गति और पुराने बेड़े पर बढ़ती निर्भरता को लेकर गंभीर सवाल अवश्य खड़े करती है।
कतर के विमान पर अरबों का सुरक्षा कवच
राष्ट्रपति ट्रंप ने १९ जून को मैरीलैंड के जॉइंट बेस एंड्रयूज में कतर से मिले बोइंग ७४७-८ विमान का निरीक्षण और अनावरण किया। कतर के शाही परिवार की ओर से अमेरिका को दिया गया यह विमान सुरक्षा, संचार और मिसाइल प्रतिरोधी व्यवस्थाओं से लैस किए जाने के बाद राष्ट्रपति के अस्थायी विमान के रूप में इस्तेमाल होगा। यह व्यवस्था बोइंग द्वारा बनाए जा रहे दो नए आधिकारिक एयरफोर्स वन विमानों की आपूर्ति होने तक जारी रहेगी।
विमान को केवल रंग बदलकर राष्ट्रपति की सेवा में नहीं लगाया गया है। इसमें सुरक्षित संचार प्रणाली, साइबर सुरक्षा, कमांड एवं कंट्रोल उपकरण और हवाई हमलों से बचाव के उपाय जोड़ने के लिए व्यापक बदलाव किए गए हैं। इन संशोधनों की लागत एक अरब डॉलर से अधिक होने के अनुमान भी सामने आए हैं। इसलिए इसे केवल कतर द्वारा ट्रंप को व्यक्तिगत रूप से दिया गया मुफ्त विमान कहना भ्रामक होगा। इसे अमेरिकी सरकार ने स्वीकार किया और अमेरिकी सुरक्षा मानकों के अनुसार तैयार कराया है। विमान की भव्यता के साथ इसका विवाद भी उतना ही बड़ा है। अमेरिकी विपक्ष ने किसी विदेशी सरकार से इतना महंगा उपहार स्वीकार करने पर संवैधानिक, नैतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी सवाल उठाए हैं। ट्रंप ने इसे अमेरिका के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक निर्णय बताते हुए आलोचनाओं को खारिज किया है।
भारत क्यों ले रहा नौ रिटायर्ड जगुआर?
रक्षा क्षेत्र से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, भारत ब्रिटेन से नौ सेवानिवृत्त एEझ्Eण्Aऊ जगुआर विमान प्राप्त करने की तैयारी कर रहा है। इन विमानों को भारतीय वायुसेना में उड़ाने की योजना नहीं है। इन्हें खोलकर इंजन, एवियोनिक्स, संरचनात्मक हिस्से और दूसरे दुर्लभ कलपुर्जे निकाले जाएंगे, ताकि भारत के मौजूदा जगुआर बेड़े को कुछ और वर्षों तक परिचालन में रखा जा सके।
भारत इससे पहले ओमान के सेवानिवृत्त जगुआर बेड़े से भी कलपुर्जे प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। जगुआर का उत्पादन दशकों पहले बंद हो चुका है और ब्रिटेन, फ्रांस तथा ओमान इसे अपनी वायुसेनाओं से हटा चुके हैं। भारत अब इसका एकमात्र सक्रिय सैन्य उपयोगकर्ता है। पुराने विमानों से उपयोगी उपकरण निकालना विमानन क्षेत्र में ‘कैनिबलाइजेशन’ कहलाता है।
तकनीकी दृष्टि से यह कोई असामान्य अथवा अपने आप में मूर्खतापूर्ण कदम नहीं है। बंद हो चुके विमान मॉडल को सीमित अवधि तक संचालित रखने के लिए दुनियाभर की वायुसेनाएं पुराने विमानों से कलपुर्जे निकालती हैं। इससे मौजूद युद्धक क्षमता को तत्काल समाप्त होने से बचाया जा सकता है और नए विमानों के आने तक समय खरीदा जा सकता है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भारत को बार-बार ऐसा करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
१९६० के दशक की डिजाइन पर निर्भरता
जगुआर की पहली उड़ान वर्ष १९६८ में हुई थी और इसे १९७० के दशक में सेवा में शामिल किया गया था। भारतीय वायुसेना में जगुआर ने गहरे प्रवेश वाले जमीनी हमलों, समुद्री अभियानों और रणनीतिक प्रहार की भूमिका निभाई है। भारत ने इसके एवियोनिक्स, रडार और हथियार प्रणालियों को समय-समय पर उन्नत भी किया है।
इसके बावजूद केवल नए हथियार और इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली लगा देने से पुराने एयरप्रâेम की आयु, इंजन की उपलब्धता और रखरखाव संबंधी कठिनाइयां समाप्त नहीं होतीं। ब्रिटेन तथा ओमान के रिटायर्ड विमानों से कलपुर्जे जुटाने की जरूरत यह बताती है कि भारत के पास जगुआर का तत्काल और पर्याप्त संख्या में उपलब्ध विकल्प नहीं है।
यह निर्णय भारतीय वायुसेना की दूरदर्शिता से अधिक उसकी मजबूरी का संकेत है। यदि समय पर नए लड़ाकू विमान पर्याप्त संख्या में शामिल किए गए होते, तो दशकों पुराने विमानों को जीवित रखने के लिए विदेशी कबाड़खानों की ओर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
स्क्वाड्रनों की कमी सबसे बड़ा संकट
भारतीय वायुसेना लंबे समय से स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या से नीचे चल रही है। पुराने मिग-२१ विमान हट चुके हैं, जगुआर और मिग-२९ जैसे बेड़ों की आयु बढ़ रही है तथा नए विमानों की आपूर्ति आवश्यकता के अनुपात में धीमी है। तेजस कार्यक्रम भारत की आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इंजन आपूर्ति, उत्पादन क्षमता और समयबद्ध डिलीवरी की समस्याओं के कारण वायुसेना को अपेक्षित गति से विमान नहीं मिल पाए हैं। पांचवीं पीढ़ी का स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए अभी विकास के चरण में है।
उधर चीन पहले से पांचवीं पीढ़ी के जे-२० स्टील्थ विमान संचालित कर रहा है। पाकिस्तान द्वारा चीन से जे-३५ विमान लेने की खबरें भी लगातार सामने आ रही हैं। हालांकि पाकिस्तान को २०२६ के अंत तक इन विमानों की आपूर्ति हो जाने का कोई निर्विवाद आधिकारिक कार्यक्रम सार्वजनिक नहीं हुआ है। कुछ रिपोर्टें समझौते और संभावित आपूर्ति का दावा करती हैं, जबकि पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ऐसी खबरों को अटकल बता चुके हैं। इसलिए संभावित खतरे को गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन अपुष्ट समय-सीमा को निश्चित तथ्य नहीं बनाया जा सकता।
पुराने विमानों के पुर्जे लेना गलत नहीं, पुरानेपन को नीति बनाना गलत
ब्रिटेन के नौ जगुआर विमानों से कलपुर्जे लेना सीमित अवधि के लिए व्यावहारिक निर्णय हो सकता है। उपलब्ध लड़ाकू विमानों को अचानक जमीन पर खड़ा कर देने से बेहतर है कि सुरक्षित एयरफ्रेम को आवश्यक पुर्जे देकर तब तक उड़ाया जाए, जब तक उनका विकल्प उपलब्ध नहीं होता।
लेकिन इसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यह भारत की रक्षा खरीद और विमान निर्माण प्रणाली में वर्षों से चली आ रही देरी का परिणाम है।
समस्या नौ पुराने विमान खरीदने में नहीं, बल्कि उस स्थिति में पहुंच जाने में है जहां भारत को अपनी युद्धक क्षमता बनाए रखने के लिए दूसरे देशों द्वारा वर्षों पहले सेवा से बाहर किए गए विमानों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
भारत को अब स्पष्ट समय-सीमा के साथ तीन मोर्चों पर काम करना होगा—तेजस उत्पादन बढ़ाना, मध्यम श्रेणी के नए लड़ाकू विमानों की खरीद का निर्णय करना और एएमसीए परियोजना को कागजी समय-सारिणी के बजाय वास्तविक उत्पादन तक पहुंचाना।
दुनिया के देश भविष्य की हवाई लड़ाई के लिए स्टील्थ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध और मानव रहित सहयोगी विमानों में निवेश कर रहे हैं। ऐसे समय भारत कब तक अपने पुराने योद्धाओं की उम्र विदेशी सेवानिवृत्त विमानों के पुर्जों से बढ़ाता रहेगा, यह सवाल केवल वायुसेना का नहीं, देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा नीति की विश्वसनीयता का है।

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