विजयशंकर चतुर्वेदी
भारत जनगणना की प्रशासनिक कवायद शुरू कर चुका है और अपने सामाजिक ढांचे का डिजिटल एक्स-रे तैयार कर रहा है। अप्रैल २०२६ से शुरू हुई जनगणना के पहले चरण ‘हाउस लिस्टिंग ऑपरेशंस’ में, लाखों गणनाकर्मी घर-घर जाकर सूचनाएं दर्ज कर रहे हैं। यह प्रक्रिया आने वाले वर्षों में महज सरकारी फाइलों का हिस्सा बनकर नहीं रह जाएगी। बल्कि इसी से तय होगा कि इस देश में प्रतिनिधित्व, संसाधन और अवसर किसके हिस्से में कितने आएंगे।
लगभग एक सदी बाद भारत में व्यापक जातिगत गणना हो रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह लोकतंत्र की आत्मपरीक्षा का क्षण है। लेकिन जनगणना वाले फॉर्म में शामिल जातिगत विवरणों ने बहस और आशंकाओं को तेज कर दिया है। समर्थक इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे ‘जातिवाद बढ़ाने’ वाला कदम कह रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ‘क्या भारत अपने समाज की वास्तविक संरचना को ईमानदारी से देखने के लिए तैयार है या फिर आंकड़ों से डरकर पुराने भ्रमों को बनाए रखना चाहता है?’
विश्वसनीय आंकड़ों का नीतिगत अंधेरा
भारत में आखिरी बार व्यापक जातिगत आंकड़े १९३१ की जनगणना में उपलब्ध हुए थे। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने समानता, आरक्षण और सामाजिक न्याय की दिशा तो तय की, लेकिन विडंबना यह रही कि जिन समुदायों के नाम पर नीतियां बनाई गर्इं, उनकी वास्तविक जनसंख्या का अद्यतन और पारदर्शी डेटा कभी सामने नहीं आया। २०११ की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (एसईसीसी) का डेटा भी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया।
परिणाम यह हुआ कि दशकों से नीतियां अनुमान और पुराने आंकड़ों के सहारे चलती रहीं। मंडल आयोग ने भी १९३१ की जनगणना के आधार पर ही ओबीसी आबादी का अनुमान लगाया था। तब से भारत की जनसंख्या दोगुने से अधिक हो चुकी है, लेकिन सामाजिक संरचना के बारे में हमारी आधिकारिक समझ लगभग उसी जगह अटकी हुई है।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि नीतिगत अंधेरे की स्थिति है। बिना विश्वसनीय आंकड़ों के आरक्षण, प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं की वास्तविक प्रभावशीलता वैâसे मापी जा सकती है? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत गणना के विरोध में दाखिल याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि सरकार को यह जानने का अधिकार है कि पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या क्या है। यह टिप्पणी अपने भीतर एक बड़ा लोकतांत्रिक संकेत छिपाए हुए है कि राज्य अगर असमानता दूर करना चाहता है, तो उसे पहले वास्तविक संरचना समझनी होगी।
क्या नए आंकड़े जातिवाद पैदा करेंगे?
जाति जनगणना के विरोध में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला तर्क यह है कि इससे समाज में जातिवाद बढ़ेगा। लेकिन यह तर्क भारतीय समाज की वास्तविकता से लगभग कटा हुआ दिखाई देता है। भारत में जाति कोई निष्क्रिय या मृत संरचना नहीं है। वह चुनावी टिकट तय करती है, सामाजिक गठबंधन बनाती है, विवाह निर्धारित करती है, नौकरियों और अवसरों तक पहुंच को प्रभावित करती है और कई बार व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तक तय करती है। विडंबना यह है कि भारत में जाति चुनाव तक हरा और जिता सकती है, मंत्रिमंडल में जगह तय करती है और सत्ता संरचनाओं को प्रभावित करती है। लेकिन जैसे ही उसे आंकड़ों में दर्ज करने की बात आती है, अचानक ‘जातिवाद बढ़ने’ का खतरा याद आने लगता है। सच यह है कि आंकड़े जाति पैदा नहीं करते; वे केवल उस वास्तविकता को उजागर करते हैं जिसे समाज पहले से जी रहा होता है। बिहार की २०२३ की जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। उस सर्वेक्षण ने दिखाया कि ओबीसी और ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग) समुदाय राज्य की आबादी का लगभग ६३ प्रतिशत हैं, जबकि सत्ता और नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी उस अनुपात में नहीं है। इस डेटा ने बहस को भावनात्मक नारों से निकालकर नीतिगत विमर्श में बदल दिया। जातिगत गणना का सबसे बड़ा महत्व भी यही है कि वह मिथकों की जगह तथ्यों को स्थापित करती है।
असली डर चुनावी गणित का
जाति जनगणना का वास्तविक असर केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और संस्थागत होगा। यदि विस्तृत आंकड़े सामने आते हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि सरकार, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालयों, सेना, कॉर्पोरेट क्षेत्र और नौकरशाही में विभिन्न समुदायों की हिस्सेदारी क्या है। यहीं से असुविधा शुरू होती है।
भारत में लंबे समय से ‘मेरिट’ की भाषा का इस्तेमाल कई बार सामाजिक विशेषाधिकारों को ढंकने के लिए किया जाता रहा है। भारतीय समाज में ‘मेरिट’ अक्सर सामाजिक पूंजी, पारिवारिक नेटवर्क और ऐतिहासिक विशेषाधिकारों का नया नाम बन जाती है। जातिगत आंकड़े उस आवरण को हटाने का काम कर सकते हैं। वे यह दिखा सकते हैं कि अवसरों का वितरण वास्तव में कितना असमान है।
आज अनेक राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से जातिगत गणना का समर्थन करते हुए भी भीतर से असहज दिखाई देते हैं। जो शक्तियां लंबे समय तक इसका विरोध करती रहीं, वे अब समर्थन में हैं। यह परिवर्तन पूरी तरह वैचारिक नहीं, बल्कि चुनावी गणित और सामाजिक दबाव का परिणाम अधिक प्रतीत होता है।
जाति की गिनती नहीं, नीति की परीक्षा
केवल जातियों की गिनती कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि उस डेटा का उपयोग वैâसे किया जाएगा। अगर जातिगत गणना केवल नए राजनीतिक ध्रुवीकरण, आरक्षण की प्रतिस्पर्धा और चुनावी गणित का हथियार बनकर रह गई, तो उसका लाभ सीमित रहेगा। लेकिन यदि इसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रतिनिधित्व की नीतियों को अधिक वैज्ञानिक और न्यायपूर्ण बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया, तब यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।
भारत की सामाजिक वास्तविकता यह है कि जाति और आर्थिक वर्ग अक्सर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। बड़ी आबादी आज भी बेरोजगारी, कृषि संकट, घटती आय, महंगी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था से जूझ रही है। इसलिए सामाजिक न्याय की बहस को आर्थिक न्याय से अलग करके नहीं देखा जा सकता। केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं होगा; अवसरों का वास्तविक विस्तार भी जरूरी है।
यह भी याद रखना होगा कि डेटा स्वयं परिवर्तन नहीं लाता। डेटा केवल दिशा देता है। परिवर्तन तब आता है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीतिगत ईमानदारी उसके साथ जुड़ती है। लेकिन बीजेपी की सत्ता लोलुपता देखकर बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं बंधती।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव नहीं
आधुनिक राष्ट्र अपनी असमानताओं को छिपाते नहीं; उन्हें स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाते हैं। जाति जनगणना डरने की चीज नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ईमानदारी की परीक्षा है। लेकिन हमने देखा है कि कई वर्षों से मोदी सरकार बेरोजगारी के आंकड़े भी छिपाए बैठी है।
भारतीय लोकतंत्र लंबे समय से सामाजिक न्याय की भाषा तो बोलता रहा है, लेकिन अब वह उस बिंदु पर पहुंच गया है जहां उसे अपने दावों को आंकड़ों की कसौटी पर साबित भी करना होगा। सवाल यह नहीं है कि जाति मौजूद है या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारतीय राज्य उसके प्रभाव को ईमानदारी से समझना चाहता है?
आंकड़े हमेशा क्रांति नहीं लाते, लेकिन वे भ्रम जरूर तोड़ देते हैं। इसीलिए लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतते जाने से नहीं, बल्कि इस ईमानदारी से होती है कि वह अपने समाज की असमानताओं को कितनी सच्चाई से देखने का साहस रखता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक हैं।)
