एम एम एस
उज्जैन के श्मशान में घना अंधेरा था। राजा विक्रम ने जैसे ही पेड़ से लटके उस भारी शव को उतारकर अपने कंधे पर रखा, शव के भीतर बैठा बेताल अट्टहास कर उठा। `राजन! इस अंधेरी रात में तुम व्यर्थ का श्रम कर रहे हो। आओ, समय बिताने के लिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं, जो एक ऐसे देश की है जहां भविष्य को `लीक’ कर बाजारों में बेचा जाता है। कहानी के अंत में यदि तुमने सही न्याय नहीं किया, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’
कहानी: शिक्षा का बाजार
`सुन एक महान देश में `नीट’ नाम की एक महा-परीक्षा आयोजित होती थी, जिसे पास कर युवा `प्राणदाता’ बनने का स्वप्न देखते थे। लेकिन वर्ष २०२६ में ३ मई की वह परीक्षा एक दु:स्वप्न बन गई। परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र लाखों रुपयों में गलियों और टेलीग्राम के गलियारों में खुलेआम बिकने लगा।’
`अमीर अभिभावकों ने दलालों के माध्यम से अपने बच्चों का `भविष्य’ खरीदा, जबकि गरीब और ग्रामीण छात्र, जो सौ-सौ किलोमीटर दूर से चिलचिलाती धूप में परीक्षा देने आए थे, उनके हाथ केवल मानसिक प्रताड़ना और पसीना लगा। यह कोई पहली दुर्घटना नहीं थी; २०१७, २०२१ और २०२४ के बाद २०२६ में भी इतिहास ने खुद को दोहराया।’
`व्यवस्था का तमाशा देख विक्रम, सरकार ने `नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ नामक एक कवच बनाया था, पर वह कवच स्वयं छिद्रों से भरा निकला। जब छात्रों ने विद्रोह किया, तो सरकार ने `उपकार’ जताते हुए कहा कि अगली परीक्षा का पंजीकरण शुल्क नहीं लेंगे। पर उन लाखों छात्रों के उस मानसिक तनाव, यात्रा के खर्च और टूटे भरोसे का हिसाब कौन देगा, जिन्होंने रात-रातभर जागकर पढ़ाई की थी?’ `इस खेल के पीछे एक भयानक आर्थिक गणित था। निजी मेडिकल कॉलेजों में करोड़ों की `पेमेंट सीट’ लेने के बजाय, २५-३० लाख में लीक पेपर खरीदना एक `सस्ता सौदा’ बन गया था। इस संगठित उद्योग में कोचिंग माफिया, प्रिंटिंग प्रेस और सरकारी तंत्र के गद्दार शामिल थे। जांच के नाम पर सीबीआई आती, गिरफ्तारियां होतीं और समय बीतने पर आरोपी जमानत पर बाहर आकर अगली परीक्षा के पेपर में `सेंध’ लगाने की तैयारी में जुट जाते।’ `नियमों का पाखंड सुनकर तुझे हैरानी होगी, छात्रों के लिए नियम कठोर थे, जूते नहीं, फुल बाजू के कप़ड़े नहीं, पानी की बोतल भी पारदर्शी। किंतु जिस तंत्र को परीक्षा करवानी थी, उसकी पारदर्शिता का क्या? १२ वर्षों में औसतन हर साल ७ पेपर लीक हुए। १.५ करोड़ छात्रों का भविष्य अंधकार में ढकेल दिया गया।’
बेताल का प्रश्न
कहानी समाप्त कर बेताल बोला, `हे राजन! अब मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो,`पहला जब किसी देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा का प्रश्नपत्र बार-बार बिकने लगे, तो इसका दोषी केवल वह `सॉल्वर गैंग’ है या वह शीर्ष सत्ता, जो जवाबदेही से कन्नी काट रही है?’ `दूसरा क्या दोबारा परीक्षा आयोजित कर लेना उन ईमानदार छात्रों के साथ न्याय है, जिन्होंने बिना किसी बेईमानी के मेहनत की थी?’ `तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, यदि मेहनत का मूल्य `सिस्टम की पहुंच’ से कम हो जाए, तो क्या उस राष्ट्र का लोकतंत्र जीवित बचता है?’
विक्रम का न्याय
राजा विक्रम स्थिर स्वर में बोले, न, सुन बेताल! यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक `राष्ट्रीय नैतिक पतन’ है।’
`प्रथम दोष, जब तंत्र बार-बार होने वाली गलतियों को `दुर्घटना’ बताने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि शासन की नीयत में खोट है। सत्ता की साख तब धूल में मिल जाती है, जब वह अपराधियों को कठोर दंड देने के बजाय छात्रों पर लाठियां भांजती है। `न्याय का ढोंग, दोबारा परीक्षा लेना केवल एक `मरहम’ है, घाव का इलाज नहीं। असली न्याय तब होता जब उन `सौदागरों’ और `गद्दारों’ को ऐसी सजा मिलती कि अगली पीढ़ी पेपर लीक शब्द सुनने से भी कांपती।’ `लोकतंत्र का अंत, जब युवाओं का अपनी संस्थाओं से विश्वास उठ जाता है, तो राष्ट्र की नींव खिसक जाती है। यदि केवल पैसों के दम पर प्राणदाता बनेंगे, तो वे भविष्य में मरीजों का इलाज नहीं, बल्कि अपने ‘निवेश’ की वसूली करेंगे।’ `राजन! तुमने सही कहा, पर तुमने मौन तोड़ा, इसलिए मैं चला!’ कहकर बेताल पुन: पेड़ पर जा लटका।
