मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: ददा हमका खरीदि लेतऽ टीबी

काहें बिसरा गांव: ददा हमका खरीदि लेतऽ टीबी

पंकज तिवारी

बाहर खूब चहलकदमी थी। चारों ओर सभी अपने-अपने कामों में भिड़े हुए थे। कुछ लोग बैठ के गप्पे भी मार रहे थे कि उसी में से चिरौंजी लाल की निगाह कैलाश का हाथ पकड़े गुस्से में लाल दादी के उपर जा पड़ी जो अब तक बरगद का पेड़ पार कर आगे निकल गई थीं कि अचानक पीछे से भागते आ रहे ददा भी दिख गए। चिरौंजी लाल अपने बगल में बैठे बहोरी को धीरे से खुटका मारते हुए उधर देखने को इशारा करता है। बहोरी भागते ददा को देखकर झटके में खड़ा हो गया और झट से दौड़ कर ददा के आगे आ गया।
‘ददा.. हे ददा… का भवा होऽ.. केस भगा जाथयऽ..?’ ददा कुछ भी नहीं बोले बस झटके में आगे बढ़ते चले गए। बहोरी, चिरौंजी, फगुना, खेलावन, सनेही सब जने पीछे-पीछे हो लिए।
दादी का रौद्र रूप देखते बनता था, इतने गुस्से में तो वो कभी नहीं हुई थीं। ददा भी आज पहली बार दादी के इस रूप को देख रहे थे कि जहां पर ददा का कोई बैल्यु ही नहीं था। उधर ईश्वर बहु चाची किसी काम से बाहर निकली थीं और उन्हीं से भेंट हो गई दादी की।
दादी हर-हर-हर-हर चलती हवा की भांति टूट पड़ीं चाची पर। चाची गोरुअन को भूसा डाल रही थीं। अचानक से हुए इस प्रहार हेतु तैयार नहीं थीं। उनके तो जैसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।
‘हे अम्मा.. पहिले तूं शांत होइ जाऽ.. चल घरा में बइठऽ अराम से तब बताऊ का बात हवइ.., काहें एतना भड़क गइ हऊ..? आवऽ चलऽ घरा में बइठऽ हो अम्मा।’
‘हां.. हां.. हम बइठहिन आइन हई तोहरे घरे.. नाती के हमरे गारी देइ-देइ भगाइ देत गऊ हऽ अउर हमइ आइ हऊ बइठावइ। शरम नाइ लागत बाऽ तोंहइ..’
दादी के बर्ताव में अभी कोई कमी नहीं हुआ था बल्कि वो वैसे ही दहाड़ रही थीं जबकि चाची को अब जाकर सारी बात समझ आ गई थी और ईश्वर चचा के बात को याद कर वो भी झेंप गई थीं।
‘कहां बा ईश्वरवा हो..? बोलाउ ओका त… पूंछी हम कि टीबी ल का असोपति खरीदि लिहे बाऽ का जवने बिना हमरे फूले एस नाती के गरियाइ के भगाइ दिहेस हऽ… बोलाउ जल्दी बोलाउ…’
‘हे अम्मा चलतू पहिले बइठि जातू अराम से तब तोहंऊ खोब गरियाइ लिहू जिउ भरि के। चलऽ बइठऽ पहिले चाय बनई, पी लऽ तब गरियाऊ खोब अउर रही बात ओनकर त ओनका हमहूं खोब डांटे रहे कि नान्ह के लड़िका से लड़िके तोहंइ काउ मिलथऽ… जानथु तऊ ओनका कि छनै भरे में पता नाइ काउ होइ जाथऽ अउर छनै भरे में ठीकउ होइ जाथेन। बदवा में कहत रहेन कि हमसे बड़ी भारी गलती होइ गइ, हमई एस नाइ करइ चाहत रहा। अबइ गऽ हयेनि चरी काटइ काटि के अइहीं त वो खुदइ जइहीं तोहरे लगे…कहत रहेन की जाइके अइया से माफी मांगब कि हमइ एस नाइ कहइ चाहत रहा।’
‘अच्छऽ अइसन बात बाऽ काऽ… चलऽ तब हमरउ दिमाग अब सही भवा अउर त आज हम… बस जानि ल पतोहु कि हमरे पे काउ गुजरत रहा हमहिन जानि सकत रहे… चल जाइदे कुलि पहिले चल चाय बनउ अउर हां हमइ बड़के कटोरा में दिहे, रचि के चाहे से जना कुछु फरकै नाइ पड़त हमइ…’
कैलाश बेचारा सकते में आ गया था कि कहां दादी झगड़ा करने आई थीं और कहां अब खोरा भर के चाय पर टूट पड़ी हैं।
अब तक ददा भी पहुंच गए थे और दूर ही खड़े होकर देखने लगे थे- ‘ईऽ का…? सारा बम्म फुस्स हो गया। हम तऽ सोचे रहे कि भवा बवाल आज। बेचारे मुस्कराते हुए धीरे से पीछे घूम लिए। झगड़ा देखने आए और सब लोग भी मुह बनाकर वापस लौट लिए। कैलाश भी दादी का साथ छोड़ कर ददा के साथ हो लिया और कहने लगा- ‘बाबू अपनेउ टीबी खरीद लऽ नऽ’
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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