मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष प्रासंगिक लेख : `आसमान के सपने, जमीन पर मलबा!

विशेष प्रासंगिक लेख : `आसमान के सपने, जमीन पर मलबा!

राजन पारकर

अमदाबाद अब सिर्फ साबरमती के किनारे बसा शहर नहीं रहा, बल्कि `विकसित भारत’ के सपनों का टेकऑफ रनवे बन चुका था-कम से कम भाषणों में तो जरूर। लेकिन कल एआई१७१ नाम की एयर इंडिया की उड़ान ने महज ५ मिनट में जो व्रैâशलैंडिंग की है, वो मानो देश के विकास मॉडल की ही धड़ाम से जमीन पर गिरती हुई तस्वीर बन गई है।
एक तरफ देश ‘२०४७ तक विश्वगुरु’ बनने की प्लानिंग कर रहा है और दूसरी तरफ एयर इंडिया का विमान टेकऑफ के कुछ ही मिनटों में इमारत से टकराकर तहस-नहस हो जाता है। यह वैâसा विकास है? `मेक इन इंडिया’ या `व्रैâश इन इंडिया’?
ये हादसा सिर्फ एक टेक्निकल फेल्योर नहीं है-ये उस पॉलिसी फेल्योर का सबूत है, जिसमें घोषणाओं का वजन तो होता है, लेकिन जमीन पर उतरते ही वो खुद ढह जाती है।
ये हादसा कहां हुआ? गुजरात में। मोदीजी के गृहक्षेत्र अमदाबाद में। वही जमीन जहां से `गुजरात मॉडल’ ने उड़ान भरी थी, वहां कल एयर इंडिया का विमान गिर जाता है। इससे बड़ा प्रतीक और क्या हो सकता है?
विमान में २४२ लोग सवार थे यानी वही जनता जो ‘विकास एक्सप्रेस’ की सवारी करने निकली थी। लेकिन जब पायलट सेल्फी में व्यस्त हो और रनवे पर गड्ढे हों, तो गंतव्य तक कौन पहुंचेगा? सवाल ये नहीं कि हादसा वैâसे हुआ, सवाल ये है कि ऐसा बार-बार क्यों होता है?
सरकारी बयान आया, ‘हम जानकारी की पुष्टि कर रहे हैं’। अब बताइए, जब राख उड़ रही हो, मलबा जल रहा हो और लोग अस्पतालों में हों, तब ‘पुष्टि’ करना किसे मूर्ख बनाना है?
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विमान इमारत से टकराया-अब ये तय कीजिए कि इमारत बीच में आई या विकास की दृष्टि में धुंध थी? या फिर विमान उड़ाने से पहले किसी ने देखा ही नहीं कि सामने क्या है?
सूत्रों के अनुसार, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपाणी भी विमान में थे। अगर ये सही है तो राजनेताओं के लिए तो जिंदगी ही अब एयरलाइंस की तरह हो गई है-न सीट कंफर्म, न लैंडिंग गारंटी!
गृहमंत्री अमित शाह ने ‘स्थिति की जानकारी ली है’। मगर इस देश में जानकारी लेना और जिम्मेदारी लेना-इन दोनों के बीच इतना फासला है, जितना जमीन और आसमान में होता है।
तो दोष किसका? पायलट का? विमान कंपनी का? एटीसी का? या उस पॉलिसी का जो सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट में ही ‘उड़ान’ भरती है?
विमान का हादसा तो दुखद है ही, लेकिन उससे बड़ा हादसा ये है कि हमारे पास हादसों से सबक लेने की कोई नीति ही नहीं है। एक घटना हुई नहीं कि जांच कमेटी बना दो, प्रेस रिलीज़ दे दो, और फिर वही ढाक के तीन पात।
अब फिर से किसी नए हवाई अड्डे का उद्घाटन होगा और नए नारों की उड़ान भरी जाएगी-`फ्लाई टू न्यू इंडिया!’
लेकिन सवाल ये है कि इस बार कौन गिरेगा? और कितनी ऊंचाई से?
इसलिए आज जरूरत है एक नए मंत्रालय की-`मंत्रालय ऑफ व्रैâश कंट्रोल’, ताकि घोषणाओं के रॉकेट और जमीनी सच्चाई के धुएं के बीच कोई संतुलन बन सके। वरना आसमान में हर सपना मलबे में बदल जाएगा और जनता सिर्फ राख समेटती रहेगी।

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