सैयद सलमान मुंबई
शिक्षा और करियर
महाराष्ट्र में एसएसी, एचएससी और स्नातक के परिणाम घोषित होते ही हर साल की तरह इस बार भी विभिन्न स्थानों पर करियर गाइडेंस मेले लगे। इन आयोजनों में समाज के विभिन्न वर्गों ने युवाओं को उनके भविष्य के लिए मार्गदर्शन देने का प्रयास किया। चुनिंदा मुस्लिम संगठनों ने भी इस दिशा में सक्रियता दिखाई। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुख्यधारा के मुस्लिम नेताओं, मठाधीशी करनेवाले स्वयंसेवी संगठनों और छपास के रोग से ग्रस्त छुटभैये नेताओं तथा जेबी संगठनों ने ऐसी कोई सार्थक पहल नहीं दिखाई। यह सवाल समाज के सामने बार-बार उठता है कि आखिर ये लोग मुस्लिम युवाओं की शिक्षा और करियर को लेकर इतने उदासीन क्यों हैं?
इस सवाल के पीछे एक बड़ा सच यह है कि मुस्लिम समाज शिक्षा के क्षेत्र में आज भी पिछड़ा हुआ है। हालांकि, पिछले दशक में मुस्लिम साक्षरता दर में ९.४ प्रतिशत की वृद्धि हुई है और अब यह ७९.५ प्रतिशत के करीब पहुंच गई है, लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है। सरकार ने अल्पसंख्यक समाज के लिए कई छात्रवृत्ति, स्किल डेवलपमेंट और कोचिंग योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन इनका लाभ समाज के बड़े वर्ग तक पहुंचाने में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है। सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता की कमी के साथ-साथ समाज के भीतर से भी ऐसी पहलों को बल नहीं मिलता।
मुस्लिम समाज के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। खासकर, कौशल और तकनीकी क्षेत्रों में। उन्हें बस सही मार्गदर्शन और अवसर की जरूरत होती है। कुछ संगठन जैसे अलिफ एकेडमी, हमदर्द स्टडी सर्कल और एजुकेशन एंड करियर गाइडेंस सेंटर आदि छात्रों को करियर काउंसलिंग और कौशल विकास की सुविधा दे रहे हैं, लेकिन इनका प्रभाव सीमित है। बड़ी संख्या में मुस्लिम नेताओं और संगठनों की प्राथमिकता राजनीतिक दबाव, आरक्षण की मांग या धार्मिक मुद्दों तक ही सीमित रहती है। युवाओं को समय पर करियर गाइडेंस मिलना चाहिए, उच्च शिक्षा और कौशल विकास के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हालांकि, यह कार्य अभी भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है।
नैतिक जिम्मेदारी
मुस्लिम नेताओं को अपने सियासी मतभेद भूलकर समाज के उत्थान का काम करना चाहिए। यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। राजनीतिक एजेंडे के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास पर भी ध्यान देना जरूरी है। मुसलमान सिर्फ भीड़ इकट्ठा करने, वोट देने और नारे लगाने की चीज नहीं है। समाज को जागरूक बनाने और युवाओं को सही दिशा देने के लिए संगठनों और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आगे आना चाहिए।
महाराष्ट्र में एचएससी के परिणामों में विज्ञान और वाणिज्य के छात्रों का पास प्रतिशत काफी अच्छा है, वहीं कला विषयों में यह कुछ कम है। इससे पता चलता है कि छात्रों में रुचि के अनुसार, विषय चुनने की प्रवृत्ति है, लेकिन उचित मार्गदर्शन की कमी है। छात्रों को विषय चुनने में मदद मिलनी चाहिए, करियर के नए विकल्पों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। बैंकिंग, आईटी, मीडिया, कानून, सिविल सेवा, डिफेंस, रिसर्च जैसे क्षेत्रों में भी मुस्लिम युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सक्रिय प्रयास होने चाहिए।
समाज के उत्थान के लिए शिक्षा और कौशल विकास दोनों जरूरी हैं। महाराष्ट्र में मुस्लिम युवाओं के लिए स्किल यूनिवर्सिटी की स्थापना की पहल हुई है, जिससे उन्हें रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। यह कदम समाज के लिए बड़ी उम्मीद है और दिखाता है कि सही दिशा में काम करने पर समाज का विकास संभव है। केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं का अध्ययन कर जमीनी स्तर तक उन योजनाओं को पहुंचाने की जिम्मेदारी समाज को लेनी चाहिए।
महिला शिक्षा
इसके अलावा महिला शिक्षा की स्थिति अभी भी चिंताजनक है। मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा दर में वृद्धि हुई है, लेकिन उन्हें उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों तक पहुंचने में अभी भी कई बाधाएं हैं। समाज में व्याप्त रूढ़िवादी सोच, शिक्षा के प्रति उदासीनता और आर्थिक अभाव के कारण कई प्रतिभाशाली युवाओं को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है। इसके लिए जरूरी है कि समाज के भीतर महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करनेवाले कार्यक्रम चलाए जाएं और बच्चियों को शिक्षा प्राप्त करने में हर संभव सहायता दी जाए। प्रतिभा के मामले में बच्चियां भी कम नहीं हैं, लेकिन मार्गदर्शन और सही मंच की कमी उनके लिए बड़ी बाधा है। समाज के सभी वर्ग अगर मिलकर काम करें तो मुस्लिम समाज का उत्थान होगा, पूरे देश के विकास में भी उनका योगदान सुनिश्चित होगा।
मुस्लिम समाज के सामने अपनी पहचान बचाने के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने की चुनौती है। सियासी मुद्दों के साथ-साथ शिक्षा और रोजगार पर उन्हें ध्यान देना चाहिए। सरकार और समाज के संगठनों को मिलकर ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए, जिनसे मुस्लिम समाज का सर्वांगीण विकास संभव हो सके और देश के विकास में उनका योगदान और भाr मजबूत हो।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
