सरक जाता हे समय

उजाड़ बस्तियों के करीब से गुज़रते कारवां ,
ज़रूर सोचते होंगे कि यहां कभी आबादियां रहती थी।
भग्न मंदिर अवशेषों की प्रतिमाएं,
कभी तो पूजी जाती थी।
लुप्त सरिताओं के चिन्ह बताते हैं
यहां कभी अबाध जलधार बहती थी।
रेगिस्तान से मिले अवशेष बोल उठते हैं ,
यहां भी कभी हरियाली लहराती थी।
भग्न भवनों के कंगूरे अपनी दबी आवाज में,
बुलंदियों को उजागर करते हैं।
विषय सुध लेने का है, क्योंकि……..!
अंतर केवल ‘था’ और ‘हे’ का है।
इस ‘था’ और ‘हे’ के मध्य आ जाता है ‘समय’,
यह समय ही है जो कभी क्रूर बन जाता है कभी विनम्र।
हाथ की पकड़ में आता नहीं, रुकता नही,
मुट्ठी की रेत सा रिस जाता है।
बीते वक्त की सिलवटें अक्सर लहूलुहान करती हैं,
जिसे न भूल पाते हैं न पुनः जी पाते हैं।
इसी उहापोह में कसमसा कर रह जाती हैं,
अनेकों ज़िन्दगियां, पीढ़ियां और सदियां।
बेला विरदी

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