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इंसानियत का फर्ज निभा

‘चल रही है यह पवित्र यात्रा,
भोले की भक्ति जिसमें शक्ति है
उठा काँवड़ रख कंधे पर,
और इंसानियत का फर्ज निभा।

भेद-भाव त्याग कर नफरत मिटा,
जिम्मेदार बन अपनी जिम्मेदारी निभा
भोले तेरे साथ हैं बस जरा उन्हें बुला,
और इंसानियत का फर्ज निभा।

दु:ख-तकलीफ बहुत है संसार में,
इसे मिटाने हेतु आगे आ
भूखे को भोजन करा, प्यासे को पानी पिला,
और इंसानियत का फ़र्ज निभा।

काँवड़ रख जिम्मेदारी की अपने कंधे पर,
ईमानदारी से मनुष्य होने का फर्ज निभा
गंगा जल-सा पवित्र है मन उसे भोले की भक्ति में लगा
और इंसानियत का फ़र्ज निभा।

दुखिया सब हैं संसार में उनका कष्ट मिटा,
मानवता बोझ नहीं, अपना धर्म निभा
जीवन जीने के लिए है तो खुशियों को फैला,
और इंसानियत का फ़र्ज निभा।

भक्ति शिव की सरल है तो भोले को मना,
जीवन में उनका चरित्र मन में बसा कर मस्त हो जा.
काँवड़ उठा कर गंगा जल भोले को चढ़ा,
और इंसानियत का फ़र्ज निभा॥

 हरिहर सिंह चौहान
जबरी बाग़ नसिया इन्दौर मध्यप्रदेश

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