मुख्यपृष्ठस्तंभभारतीय संस्कृति से होगा जनकल्याण- स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

भारतीय संस्कृति से होगा जनकल्याण- स्वामीश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती

संदीप पांडेय / मुंबई

‘परमाराध्य’ परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामीश्री १००८ अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का साठ दिवसीय दिव्य-भव्य चातुर्मास्य महोत्सव बोरीवली-पश्चिम स्थित कोरा केंद्र मैदान में चल रहा है, जहां शंकराचार्य जी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगीराज सरकार की भी उपस्थिति है। इस दौरान ‘दोपहर का सामना’ संवाददाता ने शंकराचार्य जी से कई विषयों पर चर्चा की। पेश है इस साक्षात्कार के प्रमुख अंश-

महाराजश्री, आज के युवा संतों और शास्त्रों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में उन्हें सनातन संस्कृति से वैâसे जोड़ा जा सकता है?
ये जो सोशल मीडिया वाली दुनिया आई है, ये नई पीढ़ी को हाथ में मोबाइल के रूप में मिली है इसलिए वे अभी उड़ रहे हैं। एक कहावत है न कि ‘कितना भी चिड़िया उड़े आकाश, चारा है धरती के पास’ इस दुनिया में रहते-रहते जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि जीवन सही दिशा में नहीं जा रहा है। तब उन्हें संतों के चरणों में ही आना होगा। आज के नवयुवक और बच्चों को यह बात समझनी पड़ेगी कि उनकी संस्कृति से ही उनका कल्याण होगा।

वर्तमान में गोसंवर्धन और गोसेवा की दिशा में समाज को क्या करना चाहिए?
भारतीय संस्कृति ने इस पर विशेष बल दिया है। गाय की रक्षा के लिए कितने लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। हमारे घर में जब भी रोटी बनती है तो पहली रोटी गौमाता की होती है।
गौमाता के बारे में मैंने ही नहीं, बल्कि सभी लोगों ने मिलकर बल दिया है। हमारे यहां गाय की उपेक्षा नहीं हुई है, हमेशा से उनकी रक्षा होती रही है।

‘३३ करोड़ गौ प्रतिष्ठा महायज्ञ’ आयोजन के पीछे की भावना और उद्देश्य क्या है?
इस महायज्ञ के पीछे की भावना यह है कि गौमाता के अंदर ३३ कोटि देवता रहते हैं। हम उन देवताओं को जगा रहे हैं। एक बार एक बच्चे ने हमसे पूछा था कि आपके शास्त्र में लिखा है कि गाय के अंदर ३३ कोटि देवता रहते हैं, तब जब कोई कुकर्मी गाय को काटता है तो वह देवता उसे बचाने के लिए क्यों नहीं आते हैं। यही बात मुझे चुभ गई इसलिए हमने देवताओं को जगाना शुरू किया है कि आप जाग जाइए, नहीं तो आपके ऊपर प्रश्न उठ रहा है। हमारे यहां यह पाठ पढ़ाया जाने लगा कि गाय जानवर है, जिससे उनके अंदर के देवता शयनावस्था हो गए। अब हम उन्हीं को जगा रहे हैं।

आप भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने के लिए क्या आवश्यक मानते हैं?
भारत की संस्कृति की जरूरत इसलिए है, क्योंकि दुनिया के सारे देश अपने यहां बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र बना रहे हैं। कोई परमाणु बम बना रहा है तो कोई अणु बम बना रहा है, जो राष्ट्रों की नीति है, वह दुनिया को परेशान किए हुए है। ऐसे में कोई तो ऐसा होना चाहिए, जो कहे कि नहीं अपनी सीमाओं में रहना चाहिए और उसी में संतुष्ट होना चाहिए। यह किसी दूसरी संस्कृति ने कहा ही नहीं है। यह सिर्फ भारत का इतिहास है, जिसने कभी आक्रमण नहीं किया है। ऐसी स्थिति में यह आक्रमण की जो नीतियां बन रही हैं। इसकी विभीषिका जब आएगी तो इन्हें बचाने के लिए भारत ही आगे आएगा इसलिए भारत को ही ‘विश्वगुरु’ होना पड़ेगा।

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