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इस्लाम की बात : बयानबाजी में नहीं उंगली के निशान में है लोकतंत्र

सैयद सलमान
मुंबई

बिहार की चुनावी राजनीति पर जब भी चर्चा होती है तो राज्य के उस १७.७ फीसदी मुस्लिम समाज का जिक्र जरूर होता है, जिसे अक्सर सत्ता की चाबी माना जाता है। चुनाव नजदीक आते ही नेताओं, गठबंधनों और रणनीतिकारों की निगाहें इस समुदाय पर टिक जाती हैं। जैसे ही विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज होती है, मुस्लिम वोटर्स को सियासी तराजू का मजबूत पलड़ा घोषित कर उन्हें आकर्षित करने का हर संभव प्रयास शुरू कर दिया जाता है।
टूटा भरोसा
हाल ही में आए सी-वोटर सर्वे में कुछ अहम तथ्य सामने आए हैं। ४६.२ फीसदी मुस्लिम मतदाता मानते हैं कि उनका वोट धर्म और जाति से प्रभावित होता है, जबकि लगभग २७ फीसदी अब इन चक्करों से अलग हटकर मूलभूत मुद्दों को प्राथमिकता देने लगे हैं। उनकी फिक्र शिक्षा, रोजगार, सम्मान, सुरक्षा और बराबरी को लेकर है। यानी वही सरोकार, जो किसी भी सजग नागरिक को होने चाहिए। राजनीति की भाषा में अब मुस्लिम समाज कोई एकरंगी समूह नहीं रहा। वो न तो एकतरफा तौर पर किसी के साथ है, न ही भावनाओं के झांसे में आने को तैयार है।
हालांकि, वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक को मुस्लिम समुदाय के ६८.१ फीसदी लोगों ने गंभीर चुनौती माना है। इसका साफ मतलब है कि मुसलमान अब नारे नहीं, नीतियों की पड़ताल कर रहे हैं। लेकिन चुनावी समर में इन मुद्दों की जमीन पर चिंता कम, मुस्लिम मतों की ‘बाजारू’ रणनीति ज्यादा है। नीतीश कुमार कभी ‘साख’ और ‘सुशासन’ के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन अब वे एनडीए के साथ हैं। भाजपा के साथ जाने के कारण मुसलमानों के बीच उनकी छवि कमजोर हुई है। वहीं भाजपा की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात पर मुस्लिम समुदाय का भरोसा टूट चुका है। अधिकांश इसे एक दिखावटी नारा मानते हैं, जिसका गरीब और अल्पसंख्यक तबकों से कोई लेना-देना नहीं है।
दूसरी ओर, तेजस्वी यादव खुद को ‘सेक्युलर’ राजनीति का वारिस बताते हैं, लेकिन उनके बयानों और घोषणाओं में भी ‘मुसलमानों’ की छवि एक करुणा पात्र की बनकर रह जाती है। संकट में घिरे समुदाय को ‘बचाने’ की पेशकश कर वह मुसलमानों पर डोरे डाल रहे हैं। सी-वोटर सर्वे में करीब ४५ फीसद मुसलमानों ने भले ही तेजस्वी को समर्थन दिया हो, लेकिन शेष असहमत नजर आते हैं। मतलब यह कि एकमत रुख अब बीते दिनों की बात हो चुकी है।
घोषणा नहीं रिकॉर्ड
प्रशांत किशोर की भूमिका भी दिलचस्प है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत, मुस्लिम समुदाय को ‘पीपुल्स मूवमेंट’ की बातों से जोड़ने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन व्यवहारिकता के समर में उनका ‘जन सुराज’ अभी दूर की कौड़ी नजर आता है। मुस्लिम समाज ने अब केवल नारों पर भरोसा करना बंद कर दिया है। वे चालाकी से सवाल पूछते हैं कि कौन रोजगार की नीति लाएगा? कौन शिक्षा में भागीदारी बढ़ाएगा? किसके शासन में सुरक्षा सिर्फ वादा नहीं होगी?
सच तो ये है कि मॉब लिंचिंग, पुलिसिया कार्रवाई में पक्षपात, गैर-बराबरी के अनुभव और सरकारी नौकरियों में नाममात्र की भागीदारी जैसी अनेक चिंताएं अब मुस्लिम युवाओं की जुबान पर हैं। यह वही युवा है जो स्मार्टफोन से सब देख भी रहा है और समझ भी रहा है। पटना से किशनगंज तक और सीवान से अररिया तक, वह स्थानीय हकीकतों को लेकर सचेत है। शिक्षा की बदहाल स्थिति, तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव और स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता जैसे मुद्दे अब बहस की धुरी बन रहे हैं।
गौरतलब है कि सामाजिक योजनाओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी अक्सर प्रतीकात्मक रही है। अल्पसंख्यक मंत्रालय की योजनाएं जमीन की बजाय सिर्फ कागजों पर दौड़ती हैं। कुछ जिलों को छोड़ दें तो मुस्लिम मोहल्ले आज भी शहरी जीवन के मानकों से पीछे हैं। न सड़कें हैं, न स्कूल हैं, न अस्पताल हैं। यही कारण है कि अब मुस्लिम मतदाता पार्टियों की ‘घोषणाओं’ को नहीं, उनके ‘रिकॉर्ड’ को तरजीह दे रहे हैं।
मशीन नहीं…
मुस्लिम समाज अब खुद को सिर्फ ‘वोट देने की मशीन’ मानने से इनकार कर रहा है। उसे व्यवस्था में हिस्सेदारी चाहिए। न्याय, तालीम, तरक्की, रोजगार और सम्मान उनकी प्राथमिकताएं हैं। जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर वे एजेंडा और नीतियों पर विचार कर रहे हैं। यानी जब कोई भी राजनीतिक दल यह समझेगा कि चुनाव जीतना है तो इन सवालों का सीधा और ईमानदार जवाब देना होगा, तभी असली लोकतंत्र जिंदा रहेगा।
हर चुनाव, लोकतंत्र की एक परीक्षा है और इस बार मुस्लिम समाज को तय करना है कि वह सिर्फ संख्या नहीं, एक समझदार और सक्रिय नागरिक की हैसियत से इस परीक्षा में हिस्सा ले रहा है। बदलाव न किसी वादे से होगा, न किसी पार्टी से। बदलाव होगा जब हर नागरिक अपने सवाल खुद तय करेगा और जवाबों के हिसाब से वोट भी करेगा। लोकतंत्र में असली ताकत बयानबाजी में नहीं, उंगली के निशान में होती है। इतिहास वहीं से बनता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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