प्रेम यादव / भायंदर
मीरा-भायंदर की परिवहन सेवा शुक्रवार की मध्यरात्रि से अचानक ठप हो गई, जिससे शहर के हजारों यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग, दिव्यांग, स्कूल-कॉलेज के छात्र सभी को बिना किसी पूर्व सूचना के इस कामबंदी का खामियाजा भुगतना पड़ा।
यह है आंदोलन की पृष्ठभूमि
मीरा-भायंदर मनपा की परिवहन सेवा ‘महालक्ष्मी सिटी बस ऑपरेटर’ नामक निजी ठेकेदार के माध्यम से संचालित होती है। १२९ बसों के बेड़े में ७५ डीजल और ५५ इलेक्ट्रिक बसें हैं। कुल मिलाकर लगभग ४५० कर्मचारी इस सेवा से जुड़े हैं, लेकिन इन कर्मचारियों की लंबे समय से उपेक्षित मांगें, जैसे कि वैद्यकीय सुविधा, मासिक वेतन में नियमितता, दिवाली बोनस आदि अब आंदोलन का कारण बन गई हैं। पिछले महीने ही कर्मचारियों ने प्रशासन और ठेकेदार को चेतावनी दी थी कि यदि मांगें नहीं मानी गर्इं तो १ अगस्त से काम बंद किया जाएगा, लेकिन मनपा और ठेकेदार ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। आखिरकार, कर्मचारियों ने शुक्रवार को तड़के ३ बजे से आंदोलन शुरू कर दिया।
प्रशासन का कहना है कि सुबह १० बजे के बाद सेवा बहाल कर दी गई, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोपहर १ बजे तक बसें सड़क पर नहीं लौटीं। अचानक हुए इस बंद के चलते बस स्टॉप्स पर यात्रियों की भारी भीड़ जमा हो गई। मजबूरी में लोगों को निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ा, जिन्होंने मनमाने किराए वसूल कर यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाया।
मनपा और ठेकेदार पर उठते सवाल
मीरा-भायंदर मनपा की लापरवाही इस पूरे मामले की जड़ है। कर्मचारियों की जायज मांगों की अनदेखी कर प्रशासन ने न केवल उनके अधिकारों को दबाया बल्कि आम जनता को भी संकट में डाला। निजी ठेकेदार की मनमानी और मनपा की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप
आरोप है कि यह घटना मीरा-भायंदर मनपा और ठेकेदार दोनों की असंवेदनशीलता और अक्षमता को उजागर करती है। यदि समय रहते कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान किया गया होता तो जनता को इस प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। मनपा को यह समझना होगा कि वह केवल ठेकेदारों की सहूलियत के लिए नहीं, बल्कि जनता की सेवा के लिए है। जब तक प्रशासन जवाबदेह नहीं बनता, ऐसे संकट बार-बार खड़े होते रहेंगे।
