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पड़ताल : मुंबईकरों की भूख मिटाने वालों के पेट पर लात मारने की तैयारी…हमें हमारा कारोबार छिन जाने का है डर

-हम अपने परिवार और धंधे को लेकर बहुत चिंतित हैं-धारावीकर

द्रुप्ति झा

दिन-ब-दिन बढ़ रही महंगाई के बीच अगर कोई चीज आज भी सस्ती है, तो वह है स्ट्रीट फूड। मुंबई जैसे दुनिया के तीसरे सबसे महंगे शहर में स्ट्रीट फूड से आधे मुंबईकरों का पेट भरता है, लेकिन मुंबईकरों का पेट भरने वाले लोगों के पेट पर लात पड़ने वाली है। वह भी अडानी के प्रोजेक्ट से, जो धारावी में शुरू होने वाला है।
चर्चगेट से लेकर विरार तक व अन्य स्थानों पर जाने वाले लोग साइकिल पर इडली, मेंदू वड़ा और डोसा बेचने वाले से खाते हैं। अब उन्हीं के कारखाने खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं। यह उसी धारावी से आता है, जहां अडानी के प्रोजेक्ट की वजह से किसी भी दिन इन कारखानों पर बुलडोजर चल सकता है, जो आपके खाने का इंतजाम करते हैं।
यहां सैकड़ों कारखाने हैं, जहां लाखों की संख्या में इडली-मेंदू वड़ा बनते हैं और पूरी मुंबई में सप्लाई होते हैं। पूरी रात जागकर ये लोग लोगों के लिए सुबह के नाश्ते का इंतजाम करते हैं। इनका दर्द सिर्फ अपने कारखाने उजड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन्हें उन लोगों के पेट की भी चिंता है व बढ़ती महंगाई, जिनकी जेब ढीली कर रही है। हर रोज करीब २०,००० इडली, डोसा, दाल वड़ा और मेंदू वड़ा बनाते हैं और सप्लाई करते हैं। इसके अलावा वह रोटी और दूसरे खाने के सामान भी बनाते हैं। अब उन्हें चिंता है कि इस प्रोजेक्ट के बाद वह सब कहां जाएंगे और कैसे अपने परिवार का गुजारा करेंगे।
धारावी है मिनी साउथ इंडिया
धारावी में बड़ी तादाद में साउथ इंडियन रहते हैं। अन्ना के नाम से मशहूर इन लोगों का धारावी के विकास में बड़ा योगदान है। इस जगह को मिनी साउथ इंडिया भी कहा जाता है। ये लोग सालों से यहां इडली का धंधा कर रहे हैं और मुंबईकरों का पेट भर रहे हैं। दिन हो या रात, जब आपको भूख लगती है तो वड़ा पाव और इडली-डोसा ही याद आते हैं, लेकिन धारावी में अब यह सब सिर्फ याद ही रह जाएगा। यहां का सर्वे लगभग हो गया है और कभी भी संकट आ सकता है।
चार पीढ़ियों का इतिहास हो जाएगा खत्म
यहां के साउथ इंडियन लोगों का कहना है कि वे यहां चार पीढ़ियों से हैं और उनके पूर्वजों का संघर्ष यहां की मिट्टी में शामिल है। इस बीच अपनों को जाते देखा और जेनरेशन को बदलते हुए देखा। उनका कहना है कि अब यह सब इतिहास बनकर रह जाएगा।

हमारा बचपन यहीं बीता, हमने अपने पिता को काम करते देखा और हमने सीखा। उनके बाद से घर हमारा इसी कारोबार से चलता आ रहा है। हमारे घर में सात लोग रहते हैं और कमाने वाले सिर्फ दो ही लोग हैं। हमारे ऊपर संकट आ जाएगा तो हमारा घर वैâसे चलेगा? हम यहां कई सालों से काम करते आ रहे हैं। हमारे छोटे भाई बहन स्कूल में पढ़ते हैं, जिनकी फीस इन्हीं सब काम के पैसे से भरते हैं। सरकार को इस तरीके से बसे-बसाए व्यापारियों के काम और उनके भविष्य को लेकर सोचना चाहिए।
-रोहित शेट्टी, पैâक्ट्री में काम करने वाला स्टाफ

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