संजय राऊत
भारतीय जनता पार्टी और उसकी विचारधारा आजादी के बाद उभरी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संघ विचारधारा वाले लोग नहीं थे और भाजपा का जन्म नहीं हुआ था। इसलिए आज की मोदी-भाजपा में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के प्रति द्वेष दिखाई देता है। संसद में पहलगाम हमला, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा हुई, लेकिन चर्चा में क्या दिखा? प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री शाह, विदेश मंत्री जयशंकर, भाजपा के अध्यक्ष नड्डा, इन सभी ‘महान’ नेताओं ने पहलगाम हमले का ठीकरा पंडित नेहरू पर फोड़ दिया। यह उनका वैचारिक दिवालियापन है। भारत-पाक युद्ध में चीन पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा था। यह भी पंडित नेहरू की वजह से हुआ, ऐसा श्री. मोदी और जयशंकर जैसे लोग संसद में कहते रहे। नेहरू को गुजरे ६० साल हो गए। नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, वी.पी. सिंह और अब मोदी ११ साल से देश पर राज कर रहे हैं। ये महान लोग नेहरू की गलतियों को सुधारने में विफल क्यों रहे? मोदी को ज्ञान-विज्ञान से नफरत है। पैसे, झूठ और उच्चस्तरीय बनियागीरी के बल पर वे प्रधानमंत्री बने। आजादी के बाद पैदा होनेवाले और देश के सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन में कोई योगदान न देनेवाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं। नेहरू की तुलना में मोदी, शाह जैसे लोग धूल के कण बराबर भी नहीं हैं। नेहरू का नाम बार-बार लेकर अपने अपराधों और असफलताओं को ढंकना उचित नहीं है, लेकिन मोदी के पास और कोई विकल्प नहीं है। मोदी ने क्या किया? नेहरू की ऊंचाई को ढकने के लिए अमदाबाद में सरदार पटेल की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई, लेकिन वह प्रतिमा भी रिसने लगी और अंतत: उसे ढंकना पड़ा (सरदार पटेल को भी मोदी की राजनीति रास नहीं आई)। राज्यसभा में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा के दौरान मैंने सरदार पटेल और नेहरू का विशेष उल्लेख किया। पंडित नेहरू भारतीय जनता पार्टी के ‘ट्रेजरी’ बेंच पर बैठे लोगों को जीने नहीं देते और सोने नहीं देते।
वे सरदार पटेल के स्मरण से भी विचलित हो जाते हैं। मेरे कांग्रेसी साथी क्या करेंगे? कांग्रेस ने एक ऐतिहासिक भूल की है, वो है सरदार पटेल को प्रधानमंत्री न बनाना। सरदार पटेल ने ही सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर कड़ी कार्रवाई की थी। अगर सरदार साहेब सचमुच प्रधानमंत्री होते, तो वे संघ पर स्थाई रूप से प्रतिबंध लगा देते और आज की भाजपा जो सत्ता में बैठी हुई दिखाई दे रही है, उसे उखाड़कर तब ही फेंक दिए होते। आप यहां दिखाई ही नहीं देते, लेकिन पटेल का असमय निधन हो गया और लोकतंत्रवादी नेहरू ने संघ पर से प्रतिबंध हटाकर उसे जीवनदान दिया। नेहरू एक ‘लिबरल’ थे। विचारों की लड़ाई विचारों से लड़नेवाले थे। भाजपा हर दिन नेहरू की गलतियां निकालती है। ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इसके लिए शायद एक अलग मंत्रालय बना दिया है। लेकिन नेहरू की एकमात्र गलती जिसकी देश को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, वह है संघ पर से प्रतिबंध हटाना। मोदी और शाह जैसे लोगों ने जिस तरह से धर्मांध राजनीति की ओछी और गंदी राजनीति शुरू की, उसका जिम्मेदार आज का संघ है।
अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि!
मोदी जैसे लोगों की कोई विचारधारा नहीं है। वे एक अशिक्षित, गंवार और आगे-आगे करने में आनंदित होनेवाले नेतृत्व हैं। उन्हें इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है। नेहरू एक विज्ञानवादी थे। आजादी के बाद नेहरू के कार्यों के बारे में तो सभी जानते हैं; लेकिन आजादी के आंदोलन में नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने कांग्रेस को एक अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि दी। नेहरू ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का जो अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ निर्माण किया, उसके कारण ही आजादी के बाद नेहरू, टीटो और नासिर द्वारा शुरू किया गया गुटनिरपेक्ष आंदोलन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी हो गया। महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा, हिंदू-मुस्लिम एकता, खादी, नई शिक्षा, ग्रामोद्योग और हरिजनोद्धार जैसे कई विचार स्वतंत्रता के बाद लुप्त हो गए और लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, आत्मनिर्भरता, नियोजन और गुटनिरपेक्षता जैसे नेहरू के छह विचार प्रभावी हो गए। आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है, यह विचारधारा कांग्रेस में नेहरू के कारण ही बनी। नेहरू पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह प्रतिपादित किया कि स्वतंत्रता का अर्थ गोरे अधिकारियों की जगह हिंदी अधिकारियों को लाना नहीं है। उन्होंने यह समझ लिया था कि नियोजन के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके आग्रह के कारण ही कांग्रेस ने १९३८ में सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय योजना समिति गठित की और एक योजना तैयार की। मोदी और शाह की भाजपा के लिए इस इतिहास को समझना कठिन है।
इतिहास
आज की भाजपा पंडित नेहरू पर लगातार हमले कर रही है। उन्हें ये हमले करने की आजादी पंडित नेहरू की वजह से ही मिली। अगर सरदार पटेल और सुभाष चंद्र बोस (मोदी के सुविधाजनक हीरो) प्रधानमंत्री बने होते तो वे राष्ट्रीय स्वयंयेसवक संघ को उसकी जड़ों से उखाड़ फेंकते। इससे भाजपा कभी दिखाई ही नहीं देती। अगर भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को मानती है तो एक बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि भाजपा और संघ कभी भी आधुनिकता के पक्षधर नहीं रहे। यह उनकी आज की कार्रवाइयों से स्पष्ट होता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मर्यादा और आर्थिक समानता की आवश्यकता को जितना पंडित नेहरू ने समझा, उतना संघ विचारधारा, हिंदू महासभा के लोग नहीं समझ पाए। इसलिए भारत पर अंग्रेजों का शासन आया क्यों, रहा क्यों, इस बात से उनका कोई भी लेना-देना नहीं था। १९२५ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, लेकिन संघ ने नहीं लिया। सन् १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान, हेडगेवार ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर को आश्वासन दिया था कि ‘‘संघ इस आंदोलन में भाग नहीं लेगा।’’ १९४२ के आंदोलन में अटल बिहारी वाजपेयी ने भाग लिया, लेकिन ‘‘मैं इस आंदोलन से हट रहा हूं।’’ ऐसा उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने कहा था। संघ के कुछ युवाओं ने १९४२ के आंदोलन में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की। इस पर सरसंघचालक गोलवलकर गुरुजी क्रोधित हो गए और गुरुजी ने उन स्वयंसेवकों को अनुशासनहीनता की सजा यह दी कि उन्हें अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने का आदेश दिया। १९४४ में गोलवलकर गुरुजी ने पुणे के अरणेश्वर में आयोजित संघ के शिविर में कहर मचाया। उन्होंने १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा, ‘‘वैâसा ‘भारत छोड़ो’? हवा का एक झोंका आया, दो-चार पेड़ गिर गए, इसकी अपेक्षा १९४२ में कुछ खास नहीं हुआ,’’ यह इतिहास है। पंडित नेहरू का भी आजादी के लिए लड़ने, उसके लिए जेल जाने, अपनी संपत्ति राष्ट्र को दान करने और भारत को आधुनिकता की ओर ले जाने का इतिहास रहा है। मोदी और उनकी भाजपा नेहरू की चीन विषयक नीति और उस समय के कश्मीर मुद्दे को लेकर आज भी हंगामा मचा रहे हैं। लेकिन मोदी और उनके लोग अपने ११ साल की सत्ता में जो ‘सुख’ भोग रहे हैं, वह जवाहरलाल नेहरू की वजह से है!
नेहरू से नफरत करना आसान है, लेकिन नेहरू बनना मुश्किल। ईवीएम घोटाला, पैसों का दुरुपयोग और मतदाता सूची घोटाले के कारण मोदी-शाह बनना आसान है, लेकिन नेहरू कोई नहीं बन सकता। मोदीकृत भाजपा का यह दु:ख समझना चाहिए।
