मित्र

सखा, मित्र, दोस्त कुछ भी पुकारो
सभी संबोधन अच्छे लगते हैं
यह ऐसा मधुर संबंध है
जो अपनों से भी निकट लगता है
रक्त संबंध मुंह फेर लेते जब
यह सखा ही साथ निभाता है
अवसाद और अकेलेपन को
मित्र दूर भगाता है
मुख के भाव देख मित्र सब कुछ समझ जाता है
नहीं पड़ती आवश्यकता उसको
शब्दों की बैसाखी की
उसकी दृष्टि ही स्थिति को सहज बना देती है
मायूस हृदय को ढांढस बंधाती है
शुष्क, खोखले दिनों में बादल सी बरस जाती है
कंधों पर रखे मित्र के हाथ
पहाड़ सी हिम्मत बंधाते हैं
गले लगते ही सखा के
दुख मोम से गल जाते हैं
दोस्त वहीं जो तेरे मेरे में न पड़ता
समय को सहज बना देता है
कुमार्ग पर चलने से सच्चा मित्र ही बचाता है
कभी प्यार से कभी क्रोध से
अपना फर्ज निभा जाता है
प्रतिदिन मित्र मिले न मिले
जब भी मिले चित्त प्रसन्न हो जाता है।
कृष्ण सुदामा सी पवित्र मित्रता न निभे
कभी कोई कर्ण सी मित्रता निभा जाता है।
-बेला विरदी

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