दर्द के हमदर्द

दर्द ने दर्द से पूछा, “बता तेरा दर्द क्या है?”
दर्द मुस्कुराया और बोला,
“दर्द होकर भी तू नहीं समझता दर्द की पीड़ा,
तू कैसा दर्द है ये! (‘रे’ अपनापन)
पगले, जो तेरा दर्द, वही तो है मेरा दर्द।”
सुनते ही दर्द का दर्द कुछ कम हुआ, फिर बुदबुदाया दर्द
“बड़ा बेदर्द है ये जमाना, दर्द का दर्द कब इसने जाना
दर्द का साथ, दर्द ने है निभाना।”
फिर क्या था दर्द और दर्द मिल एक हुए
या यूं समझो कि एक और एक मिल हुए ग्यारह।”
दर्द मिलते गए…दर्द जुड़ते गए
सिलसिला दर्द का चलता गया,
फलता गया, आगे बढ़ता गया
न बंटने के लिए होते हैं दर्द…न घटने के लिए
दर्द का काम है इतिहास गढ़ना
दर्द न चाहे राहत या ठिकाना
दर्द का धर्म है दर्द में घुल-मिल जाना
दर्द घने हैं, अब क्या इनका हिसाब लगाना
चंद खुशियों से भरे हैं दर्द अपने
खुशियों के जल, छिन जाने का डर बना रहता है
कौन मूर्ख आकर हमारा दर्द चुराएगा?
दर्द, आजाद मुल्क के आजाद परिंदे हैं
ये कब, कहां रुख कर जाएं,
कोई नहीं जान पाया है…
ये क्या कम है कि दर्द जख्मी हैं
फिर भी मुस्कुराते हैंं!
कब कोई इन्हें रोक पाया है?
लाख कोशिशें बेकार हैं, जहां दर्द की बहार है,
कयास न लगाना कि दर्द ‘कराह’ रहे हैं
वे तो अपना सुख दुःख साझा कर रहे होते हैं
“कौन खुशियां बांटता है जहां में?”
ये मैं नहीं, दर्द पूछ रहे हैं और कह रहे हैं
“हमारे पास आओ अपना दर्द लेकर
बेशक लौटोगे ‘राहत’ झोली भरकर क्योंकि
हम दर्द हैं…दर्द के हमदर्द हैं।”
-त्रिलोचन सिंह अरोरा

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