जाते हुए भादों मास के मेघ
कुछ अधिक डरा रहे हैं
रह-रह दामिनी दमकती-गरजती
गगन के वक्ष पर
विद्युत रेखा दमका रही है
ऊंचे भवन के कंगूरों पर
गुटर गूं करते कपोतों का वृंद
खोल अपने पंख नभ में उड़ गया है
अपनी परिधि में उड़ कर पुनः
कंगूरों पर सिमट रहा है
सुहाने मौसम में यही पंछी
स्वच्छंद हो उड़ान भरते
नील गगन में अपना अधिकार समझते
मिल कर सब धरा पर उतर
अपना चुग्गा चुगते हैं
क्षुधा पूर्ति होते ही नभ की उड़ान भरते हैं
पंखों में नहीं छुपाते एक भी दाना
है विश्वास मिटेगी कल भी क्षुधा
होगी उदर पूर्ति अवश्य
न कोई व्याकुलता, न बैचेनी
क्यों धरे मन में मानव सी आशंका
जो अपनी आने वाली पीढ़ी हेतु
संपत्ति संचय के जुगाड़ में रहता
आशंकित है कहीं आने वाली संतानें
हाथ-पैर बिन पंगु जन्मी
केवल कुशाग्र प्रज्ञा होगी उनके पास
कैसे भूख त्रिशा मिटाएंगे
धैर्यता-सहजता न होगी
परिश्रम कष्ट उठाने में होंगे अस्मर्थ
अभी से उनके लिए करना होगा संचय सब कुछ।
-बेला विरदी
