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देवाभाऊ…और ब्लैंकेट न्यूज का करिश्मा!

राजन पारकर

राज्य के अखबारों के पहले पन्ने पर आम आदमी उम्मीद करता है कि कोई बड़ा घोटाला, मंत्री की करतूत, जनता की बदहाली की खबर छपी होगी। लेकिन जमाना बदल गया है। पहले पन्ने पर सिर्फ एक ही शब्द छपा-“देवाभाऊ…”और कुछ भी नहीं।
वाह! कमाल है। मानो समूचे ब्रह्मांड का रहस्य इसी एक शब्द में समा गया हो। आगे न नाम, न संस्था, न पार्टी, यहाँ तक कि विज्ञापन देने वाले का पता भी नहीं। “देवा” के साथ “भाऊ” जोड़ दिया और बस-राजनीति, धर्म और चुनाव सबका हिसाब निपट गया।
अब तक हमने पेड न्यूज देखी थी-पैसे देकर खबर छपवाना। फिर आई मैनेज न्यूज-सच को दबाकर झूठ छपवाना। और अब आया है नया चमत्कार-ब्लैंकेट न्यूज! मतलब, पूरे पन्ने को ऐसे ढक दो कि असली बात किसी को नजर ही न आए।
यानी, अखबार की जगह खरीदो, चाहो तो कुछ न कहो, लेकिन विज्ञापन फुल पेज का होना चाहिए। पाठक बेचारा अखबार खोलता है और सामने प्रकट होते हैं-‘देवाभाऊ’। अब पाठक का कन्फ्यूजन-देव कौन? भाऊ कौन? और विज्ञापनदाता कौन?
“अरे भई, एक शब्द को इतना महत्व दिया है कि अगर कल अखबार में ‘पानीभाऊ…’ छाप दिया, तो क्या जनता की प्यास बुझ जाएगी?”
या फिर-“एक शब्द छापने के लिए करोड़ों खर्च करने की तैयारी है, मगर जनता के पेट के लिए एक दाना चावल नहीं। यही है हमारे लोकतंत्र का नया ‘भाऊगर्दी’ प्रयोग।”
आज पत्रकारिता की हालत यह है कि खबर से ज्यादा विज्ञापन बोलते हैं। और अब विज्ञापन भी आधे शब्दों में नहीं, बल्कि एक ही शब्द में सब कुछ कह डालते हैं। इस एक शब्द के पीछे कौन है-यही रहस्य जनता को तिल-तिल कर सोचने पर मजबूर करता है।
इसलिए, अब हमें अखबारों की सुर्खियों का इंतजार बंद करना चाहिए। कल को किसी दिन ‘माऊली’, ‘सखा’, ‘जय हो’, ‘भाऊराव’ जैसे विज्ञापन छपेंगे, और जनता सिर पकड़कर सोचेगी – ये किसका इशारा है? किस पार्टी की चाल है?
पत्रकारिता कितनी और कहां बिकेगी, इसका रोज नया अध्याय हमारी आंखों के सामने लिखा जा रहा है। मगर पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि असली खबर तो देवाभाऊ के पीछे छुपी हुई है।
एक ही फटकार में कहें तो-देव हैं या भाऊ, ये तो समझ में नहीं आया; लेकिन इतना तय है कि अखबार अब भगवान का खेल न रहकर भाऊगर्दी की राजनीति बन चुके हैं।

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