डॉ. ममता शशि झा, मुंबई
गुंजन के सखी नेहा विदेश से आयल छलखिन, आई हुनका स भेट कर लेल आब बला छलखिन त ओ अपन दोसर संगी अखिला के सेहो दुपहरियामे भोजन कर लेल बजा लेलखिन। आई काल्हि अखिला बहुत व्यस्त भ गेल छलि, पता नहिं कोन एजेंसी खोलि लेने छलि जे व्यस्तता बड़ बढ़ि गेल छलनि। आ कखनो काल जे फोन पर गप्प होई छलनि दुनुके सेहो नहिं भे पाबई छलनि। गुंजन के मोनमे इहो बात छलनि जे भेटो भे जायत आ ओ क्या बेर जे नेहा, गुंजन के ई बात कहई छलखिन जे हमर एजेंसीमे बड़ काज रहई छई अहुँ हमरा संगे जुड़ि जाऊ से काजो बुझि जेबई।
नेहा हुनका घरमे ऐबे केलखिन की हुनकर फोनक घंटी टुनटुना उठलनि, फोन दिस देखिते हमरा सबके गला लगलि आ कहलथि जे फोन पर गप्प के लई छी।
नेहा फोन पर बतिया लगली, ‘हा कहु केहन पैकेज चाही अहाँ के सब चीज हमरे सबके कर के अछि या अहुँ सब किछु करबनि, हमरा पैकेजमे सब किछु भेटत अहाँके, अर्थि उठाब बला स लऽ क मच्छामास तकके, अहाँके की चाही से कहु। अर्थि उठाब बला के चार्जेस अहि पर निर्भर रहत जे करत जे जाय बलाके कतेक दूर तक ल जेबाक छनि, कतेक लोक कान लेल चाही, आ क्या दिन चाही, पंडित, महापात्र बैदिक आ कर्ता पाचक जे द्वादसा दिन ऐता घाट पर सँ त ओ बिध कर्ता के कनिया करथिन, की हमरा एजेंसी के लोक करत। रोज अहाँ सब कर्म करबनि की एक्के दिनमे, से सबटा डिटेल्स हमरा पठा दिय, त हम ठीक सँ कतेक पाई लागत से कहि सकब। आई काल्हि अपनो सबमे बैठक राख के चलन भ गेल छई, लोकसब ई नहिं चाहई छथिन जे क्यो कखनो आबि क भेट करे जेना अपनामे होई छई, हुनका सबके ओहिमे डिस्टर्बेंस होई छनि, यदि बैठक राख के होयत त ओकर पैसा सेहो जुड़ि जायत, ओहिमे अहाँके कोन तरहक फूल चाही ताहिपर निर्भर करत।
ओना हमरा नोरमल पैकेजमे अर्थि उठाब बला, पचासटा फूल-माला, दसटा कान बाली, आ ओहि दिन लोकसब के घूरि क आब के बाद तक रुकल रहई छथिन ओ सब जाहि सँ लोकसब के बुझाई जे ई सब अहाँ के अपन लोक छथि!
हँ; हँ एकदम अप्पन लोकसब जकाँ कनई जाय छथिन, ओकर अहाँ चिंता नहीं करू!
अच्छा अहाँके चारिए दिनमे सब किछु करबाक अछि! ठिक अछि हम ओकर पैकेज मेल के दई छी!
गुंजन आ नेहा छगुंता भे के सबटा फोनपर होब बला गप्प सुनि रहल छलि। अखिला के चेहरा पर ई सब गप्प कर काल कोनो संवेदना नहिं छलनि!
