सीप

एक चंचल जल का रेला,
सलिला तट सिक्ता पर एक सीप छोड़ गया।
नन्ही सीप कुछ समझ न पाई,
जल से बाहर वह कैसे आई।
मैं कर रही थी जल में अठखेलियां,
संग थी मेरे मेरी सीप सहेलियां।
जल, तेरे मन में यह क्या आई,
मन से मैंने तो मर्यादा निभाई।
वारी तुझसे तो हे मेरे जन्म-मरण का नाता,
तू अपनी सीमा क्यों कर लांघा।
गर बह रही थी तुम संग-संग मैं,
फिर मुझे अपने साथ
ही ले जाता।
तेरी सिक्ता कण को अपनी कोख में धारूं,
मुक्ता बना जग को दे डालूं।
यश तुम्हारा ही तो होता,
मैं कहलाती मीठी सलिला की मुक्ता।
आह! तुमने यह क्या कर डाला,
क्यों मुझे असमय ही मार डाला।
उत्शृंखलता की सीमा न लांघो,
जिओ और जीने दो का मर्म पहचानो।

बेला विरदी

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