मुख्यपृष्ठस्तंभभाजपा के खजाने पर गोपनीयता का पर्दा क्यों?

भाजपा के खजाने पर गोपनीयता का पर्दा क्यों?

-एनजीओ के चंदे की पाई-पाई का हिसाब

देश में जब भी गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ को मिलने वाले चंदे की बात आती है, सरकार पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और जवाबदेही की दुहाई देने लगती है। विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी एफसीआरए के तहत एनजीओ से पूछा जाता है कि पैसा कहां से आया, किसने दिया, किस बैंक खाते में जमा हुआ और किस काम पर खर्च किया गया। नियमों का उल्लंघन होने पर उनका पंजीकरण निलंबित या रद्द तक किया जा सकता है। सवाल यह नहीं है कि एनजीओ से हिसाब क्यों मांगा जा रहा है। सवाल यह है कि यही कठोरता भाजपा को मिलने वाले चंदे पर क्यों दिखाई नहीं देती।
आखिर राजनीतिक दल कोई साधारण सामाजिक संगठन नहीं हैं। वे चुनाव लड़ते हैं, सरकार बनाते हैं, कानून तैयार करते हैं, सरकारी नीतियां तय करते हैं, उद्योगों को लाइसेंस और ठेके देने वाली व्यवस्था को प्रभावित करते हैं तथा हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक बजट पर नियंत्रण रखते हैं। ऐसे में भाजपा को पैसा देने वाले दानदाताओं की पहचान जानना आम नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार होना चाहिए। लेकिन व्यवस्था ऐसी बनाई जाती रही है कि जनता मतदान तो खुले तौर पर करे, मगर भाजपा की तिजोरी भरने वालों की जानकारी उससे छिपी रहे।
यदि किसी एनजीओ को मिलने वाला विदेशी चंदा राष्ट्रीय हित को प्रभावित कर सकता है, तो क्या किसी राजनीतिक दल को मिलने वाला अज्ञात या संदिग्ध चंदा लोकतंत्र, नीतियों और चुनावी पैâसलों को प्रभावित नहीं कर सकता? क्या यह जानना आवश्यक नहीं है कि किसी बड़ी कंपनी, कारोबारी समूह या प्रभावशाली व्यक्ति ने किस दल को कितना पैसा दिया और उसके बाद सरकार की नीतियों में उस दानदाता को कोई विशेष लाभ तो नहीं मिला? चंदा यदि निस्वार्थ है तो दानदाता का नाम छिपाने की जरूरत क्या है?
लोकतंत्र केवल मतदान मशीन तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है- सत्ता, नीति, चुनाव और राजनीतिक धन के स्रोतों में पारदर्शिता। जब चंदा गोपनीय होता है तो जनता के सामने यह संदेह स्वाभाविक रूप से पैदा होता है कि कहीं राजनीतिक चंदे के बदले सरकारी ठेके, नीतिगत रियायतें, जांच एजेंसियों से राहत, करों में छूट या अन्य लाभ तो नहीं दिए गए। इसीलिए राजनीतिक चंदा केवल दल और दानदाता के बीच का निजी लेन-देन नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित का विषय है।
एनजीओ से कहा जाता है कि वह एक निर्धारित बैंक खाते में पैसा ले, प्रत्येक खर्च का प्रमाण रखे और सरकार को नियमित रिपोर्ट दे। फिर भाजपा के लिए भी ऐसी ही सार्वजनिक और ऑनलाइन व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? प्रत्येक बड़े चंदे के साथ दानदाता का नाम, राशि, तारीख, भुगतान का माध्यम और संबंधित कंपनी या व्यक्ति का विवरण सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होना चाहिए। भाजपा के खातों का स्वतंत्र ऑडिट हो और गलत जानकारी देने पर मान्यता निलंबित करने तक की कार्रवाई हो।
सबसे गंभीर प्रश्न कानून की समानता का है। यदि पारदर्शिता राष्ट्रहित में है तो वह केवल एनजीओ के लिए नहीं, भाजपा के लिए भी अनिवार्य होनी चाहिए।
सामाजिक संस्थाओं के चंदे पर सरकारी सूक्ष्मदर्शी और भाजपा के खजाने पर गोपनीयता का मोटा पर्दा—यह व्यवस्था न तो न्यायसंगत है और न लोकतांत्रिक।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि चंदे की पारदर्शिता का सिद्धांत सार्वभौमिक है या केवल असहमति की आवाज उठाने वाले संगठनों को नियंत्रित करने का औजार। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने वाली राजनीति का खर्च कौन उठा रहा है। एनजीओ से पाई-पाई का हिसाब मांगने वाली व्यवस्था भाजपा को चंदे की गोपनीयता का विशेषाधिकार नहीं दे सकती। कानून का तराजू तभी निष्पक्ष माना जाएगा, जब उसकी एक ही कसौटी सामाजिक संगठनों और सत्ता चलाने वाले दलों, दोनों पर समान रूप से लागू होगी।

 

 

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