भारतीय न्याय व्यवस्था पर जितना लिखा और बोला जाए, उतना कम ही है। कई बार उम्मीद की किरण दिखाई देने लगती है और तुरंत अंधेरा छा जाता है। भारतीय न्याय व्यवस्था भारत के संविधान पर आधारित एक स्वतंत्र व्यवस्था है। संविधान ने हमारी न्यायपालिका को कानून के रक्षक और बुनियादी अधिकारों के संरक्षक के रूप में स्थान दिया है। ऐसी `दंतकथा’ है कि यह देश के सर्वोच्च कानून और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है, लेकिन यह सब करने के लिए हमारी न्याय व्यवस्था को जो बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं, वे नहीं मिल सकीं। सरकारी जिला स्तर के अस्पतालों जैसी ही न्यायमंदिरों की हालत है। इसीलिए इंसाफ में देरी होती है, ऐसी शिकायत है। सही-गलत तो न्यायदेवी ही जाने! इस माहौल में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का विधेयक मंजूर करवा लिया। लोकसभा और राज्यसभा में भारी हंगामे के बीच सरकार ने इतना महत्वपूर्ण विधेयक जबरन पारित करा लिया। यह जोर-जबरदस्ती सही नहीं थी। यह सच है कि सुप्रीम कोर्ट में आज भी ९२ हजार मामले लंबित हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि हजारों लोगों का इंसाफ का इंतजार है। इससे कई लोगों की जिंदगी ठहर गई होगी। यह तस्वीर बदलने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट जज संख्या संशोधन विधेयक २०२६ लाई और जल्दबाजी में मंजूर करवा लिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या ३४ थी। अब मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर यह संख्या ३८ हो जाएगी। यह संख्या बढ़ने से भारतीयों के जीवन स्तर में गुणात्मक क्या फर्क पड़ने वाला है? जजों की संख्या बढ़ी यह सच है, लेकिन गुणवत्ता और कर्तव्यनिष्ठा बढ़े बिना
`तारीख पर तारीख’ का खेल खत्म
नहीं होगा।अब जजों की संख्या बढ़ने से न्यायदान प्रक्रिया में तेजी आएगी। सालों-साल लटके पड़े मामलों का निपटारा होगा। जजों की कमी की वजह से रोजाना के कामकाज मर्यादित हो रहे थे। कई महत्वपूर्ण `अपीलें’ और याचिकाएं महीनों-महीनों लिस्टिंग के इंतजार में रहती थीं। अब चार ज्यादा जज आने से एक ही समय पर अधिक पीठ (बेंच) बनाई जा सकेंगी। रोजाना के मामलों में तेजी आएगी। महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई को ज्यादा वक्त दिया जा सकेगा। नतीजतन, सालों-साल से अटके पड़े मामलों से धूल झाड़ी जाएगी। बैकलॉग खत्म हो जाएगा। संविधान पीठों पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। कई संवैधानिक और सार्वजनिक राष्ट्रहित के मामले ५, ७ या ९ जजों की पीठ के सामने चलाना जरूरी होता है, लेकिन जजों की कमी की वजह से यह नहीं हो पा रहा था। अब चार जजों की बढ़ोतरी से मुख्य न्यायाधीश अधिक संविधान पीठें गठित कर सकेंगे। महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर जल्द फैसले आएंगे। इससे कानून के राज की परिभाषा साफ होगी। देशभर की अदालतों को दिशा मिलेगी। राज्यों से सुप्रीम कोर्ट में आने वाले मामलों को विशेष न्याय मिलेगा। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के उच्च न्यायालयों में भी लाखों मामले लंबित हैं। इन्हीं उच्च न्यायालयों से बड़ी संख्या में अपीलें और विशेष अनुमति याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचती हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही ऐसे मामलों की सुनवाई में देरी होती है। उसका असर राज्यों के उच्च न्यायालयों पर पड़ता है। अब सुप्रीम कोर्ट में जज बढ़ने से ऐसी लंबित अपीलों और याचिकाओं का निपटारा जल्द होता रहेगा। हाई कोर्ट के पैâसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अपीलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इन मामलों के पैâसले भी जल्द आएंगे। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच अटका पड़ा इंसाफ शायद अब खुली सांस लेगा। संपत्ति के विवाद, पारिवारिक मामले, उद्योगों के झगड़े, भ्रष्टाचार के मामले, जमानत की अर्जियां, मानव अधिकारों से जुड़े मामले, राजनीतिक दलों की
तोड़-फोड़ के विवाद
सालों से अदालतों में पड़े हुए हैं। उनके अब समय-सीमा में निपटारे की उम्मीद है। बड़े लोगों के न्याय के लिए मुख्य न्यायाधीश द्वारा आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट खोलकर सुनवाई करने के कारनामे हुए हैं। अब गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को सालों-साल सुप्रीम कोर्ट की चौखट नहीं घिसनी पड़ेगी। कचहरी के चक्करों में खर्च करके जो उस बोझ से कर्जदार होकर टूट गए, ऐसे लोगों के लिए अब उम्मीद की किरण दिखाई देने लगेगी। सुप्रीम कोर्ट तक हर कोई नहीं पहुंच सकता, लेकिन जो पहुंचते हैं उन्हें सही तरीके से इंसाफ मिले, बस इतनी ही उम्मीद होती है। इंसाफ में देरी यानी इंसाफ से इनकार, यह सिर्फ कहा जाता है। शिवसेना टूट का, पार्टी के चुनाव चिह्न का मामला पिछले चार सालों से धूल फांक रहा था। वह अब कहीं जाकर सुनवाई पर आया है। संविधान के बुनियादी ढांचे को ठेस पहुंचाकर सत्ता हासिल करने का यह मामला लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोतने वाला था और इस मामले में एक गैर-कानूनी सरकार महाराष्ट्र पर राज करती रही। सुप्रीम कोर्ट ने वक्त रहते दखल दिया होता तो संविधान की प्रतिष्ठा बनी रहती। चार साल बाद यह मामला सुनवाई के लिए आया, यह भी कोई कम बात नहीं है! जजों पर काम का अतिरिक्त बोझ पड़ने से उनके निर्णय लेने की क्षमता की गुणवत्ता गिरती है। सुप्रीम कोर्ट में जज साहबान की संख्या बढ़ने से कामकाज में अब गुणात्मक फर्क पड़ेगा। सिर्फ चार जजों की नियुक्ति न होने की वजह से सुप्रीम कोर्ट में न्यायदान का स्तर गिर गया था, मामले लंबित थे, न्याय व्यवस्था चरमरा गई थी, यह बात इस नए `जज’ विधेयक से देश को समझ आएगी। अब चार `माई लॉर्ड’ के आ जाने से सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा, न्याय व्यवस्था मजबूत हो जाएगी, ऐसा सरकार को लगता है; जाहिर है, वैसा लोगों को भी लगना चाहिए। फिर भी `न्याय’ विधेयक का स्वागत!
