अजय भट्टाचार्य
बाबा तुलसीदास लिखकर चले गए-
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरत देखि तिन तैसी
भावना का अर्थ मन के भाव, विचार, संवेदना, या किसी बात की गहराई से कल्पना करना होता है। भावना परिस्थिति अनुसार विभिन्न रूप धारण करती है। भावना बहुआयामी होती है इसलिए यह कहीं दुर्भावना, कहीं सद्भावना, जनभावना, मनभावना आदि संज्ञा स्वरूपों में नजर आती है। जब भावना क्रिया में परिवर्तित होती है तो भावना उमड़ती है, हर्षित होती है, आहत होती है और कभी-कभी तो शून्य हो जाती है। भावशून्यता अर्थात सुख दुख से परे, एकदम उदासीन। आयुर्वेद में `भावना’ एक विशेष पारंपरिक औषधि निर्माण विधि है जिसमें जड़ी-बूटियों के चूर्ण को रसों या काढ़े के साथ घोंटा जाता है।
इन दिनों भावना आहत भाव से गुजर रही है। ज्ञात हुआ है कि संसद परिसर में एक प्रहसन में एक सांसद के भगवा वेश धर कर अभिनय करने पर भावना अत्यंत शोकाकुल है। उसको पृथ्वी पर अपना मस्तक पटक कर अहर्निश विलाप करते देखा गया है।
किंतु हे देवी भावना, जब एक अति मिथ्याचारी सामान्य मनुष्य भीमकाय रूप धरकर पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अति लघु स्वरूप को मंदिर में गृह प्रवेश करवा रहा था तब आप किस लोक परलोक में थीं? जब एक अजैविक नेतावेशधारी अभिनेता पवनसुत श्रीहनुमान जी को पतंग में सजा कर दिग-दिगंत में उड़ा रहा था, तब आप किस अंधकूप में विराजमान थीं देवी? जब एक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चल समारोह के समक्ष एक कार्यकर्ता को भगवान श्रीराम के अनन्य सेवक `अंजनीपुत्र पवनसुत नामा’ के वेश में जनमार्ग पर नृत्य करवाया जा रहा था, तब आप दादुर के सदृश कहां सुषुप्तावस्था में थीं सुकोमले? जब गत एक दशक से आपके महानायक को भगवान विष्णु का ११वां अवतार, भगवान राम, भगवान कृष्ण आदि बताया जा रहा है तब आप किस आकाशगंगा में विचरण कर रह रहीं थीं, हे सुशीला?
जब भगवा भेष धारी कथित साधु, प्रवचनकार अनाचार, दुराचार, व्यभिचार में लिप्त पाए जाते हैं तब आप किस पाताल लोक में निवास करती रहती हैं, श्रद्धेय? और अभी-अभी जब भगवान श्रीराम के मंदिर में दान चोरी, चढ़ावे की संगठित डवैâती हुई, तब आप कहां सरयू के अतल तल में जलमग्न रहीं, आदरणीया? विभिन्न क्षेत्रों से हरिद्वार मार्ग पर जमघट लगाए कांवड़ियों का उत्पात सनातन का किस तरह का सम्मान है, देवी भावना? आप इस पर भी मौन हैं। ब्रह्म कमंडल से विष्णुपद होते हुए प्रगटी गंगा के स्वघोषित मानसपुत्र ने नमामि गंगे में करोड़ों रुपए डुबो दिए, तब हे आद्रचित्ता आप कहां जलमग्न थीं और महाकाल लोक में नकली प्रतिमाओं की स्थापना पर भी आप आहत नहीं हुईं! आपके `चयनित’ आहत भाव प्रश्नाधीन हैं, देवी। और प्रश्न तो अनेकानेक हैं किंतु हे भौकाली भावना! आप इतने ही प्रश्नों पर आत्म चिंतन कर लेंगी तो लज्जावश `कीच सरोवर’ में समाधि ले लेंगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)
