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रंगा-बिल्ला ने बच्चों को मारा…देश रोया…तिहाड़ जेल में दे दी गई क्रूर हत्यारों को फांसी

जब हम इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो १९७८ का रंगा-बिल्ला कांड आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। ये कहानी दो मासूम बच्चों, गीता और संजय चोपड़ा की हत्या और बलात्कार की है, जिसने पूरे भारत को झकझोर दिया। रंगा और बिल्ला दो छोटे-मोटे अपराधी, जिन्होंने फिरौती के लालच में एक ऐसा अपराध किया, जिसने उन्हें देश के सबसे खूंखार हत्यारों में शुमार कर दिया।
एक भयानक अपराध की शुरुआत
१९७८ में दिल्ली के धौला कुआं इलाके में १६ साल की गीता और १४ साल के संजय चोपड़ा आकाशवाणी के लिए निकले थे। गीता जीजस एंड मैरी कॉलेज में पढ़ती थी और उस शाम दोनों भाई-बहन को युववाणी के एक रेडियो शो में हिस्सा लेना था। बारिश का मौसम था और दोनों ने एक फिएट कार से लिफ्ट ली। ये कार रंगा और बिल्ला चला रहे थे, जो मुंबई से दिल्ली आए छोटे अपराधी थे। उनकी योजना बच्चों को अगवा कर फिरौती मांगने की थी।
क्रूरता की हद
रंगा और बिल्ला दोनों बच्चों को दिल्ली के बुद्धा गार्डन के सुनसान इलाके में ले गए। वहां उन्होंने पहले संजय की चाकू से हत्या की, जिसके शरीर पर २१ घाव पाए गए। फिर गीता के साथ बलात्कार किया और उसकी भी हत्या कर दी। पोस्टमार्टम में गीता के शरीर पर पांच घाव मिले। इस क्रूरता ने पूरे देश को गुस्से से भर दिया।
तलाश और फांसी
पुलिस ने इस मामले में तुरंत कार्रवाई की। एक प्रत्यक्षदर्शी ने तेज रफ्तार कार में बच्चों की चीख सुनी और पुलिस को कार का नंबर एचआरके ८९३० बताया। रंगा और बिल्ला दिल्ली से मुंबई और फिर आगरा भागे। कालका मेल ट्रेन में सैनिकों के डिब्बे में चढ़ने की गलती ने उन्हें पकड़वा दिया।
३१ जनवरी १९८२ को तिहाड़ जेल में रंगा और बिल्ला को फांसी दी गई। फांसी से पहले उन्हें बक्सर जेल से लाई गई खास रस्सी का फंदा पहनाया गया। रंगा आखिरी पल तक हंसता रहा, जबकि बिल्ला डर से कांप रहा था। फांसी के बाद उनके शवों को कोई लेने नहीं आया और जेल प्रशासन ने अंतिम संस्कार किया। इस कांड ने भारत में इंसाफ की मांग को और मजबूत किया। तिहाड़ जेल के कर्मचारी सुनील गुप्ता की किताब ‘ब्लैक वॉरंट’ में इस घटना का जिक्र है, जो बताता है कि वैâसे पूरा देश रंगा-बिल्ला को फांसी पर देखना चाहता था। यह मामला आज भी हमें याद दिलाता है कि अपराध की सजा से कोई नहीं बच सकता।

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