मुख्यपृष्ठस्तंभभोजपुरिया व्यंग्य : बिहार के चुनाव में परिवारवाद के बहार बा

भोजपुरिया व्यंग्य : बिहार के चुनाव में परिवारवाद के बहार बा

प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही

बिहार में चुनाव में हिताई-नताई अउरी परिवारवाद के बोलबाला बा। अब राजनीति, परिवारिक मिलन समारोह हो गइल बा। कहीं ससुर बहू के टिकट दे रहल बा, त कहीं पति-पत्नी के कहत बा जानू, अब तोहर बारी बा विधानसभा सँभालइ के। अब जनता सोचत बा, ए भाई, ई चुनाव बा कि ससुराल सम्मेलन।
लोग नया नारा बनावल बाड़े ‘नातेदारी विकास संगठन।’ नेता लोग कहत बा, लोकतंत्र घर-घर पहुँचे। जनता कहत बा, अरे भाई, अब घर-घर से टिकट निकल रहल बा।
पति बीजेपी से, पत्नी आरजेडी से, ससुर जेडीयू में, अउर समधी कांग्रेस में। जनता कन्फ्यूज बा कि अब वोट देई केकरा के। गाँव के चाय दुकान पर बूढ़ा बाबा कहले, पहिले नेता जनता के सेवा करत रहे, अब अपना घर के सदस्यन के सेवा करत बाड़े।
दूसरा तुरंते बोल पड़ल, अरे बाबा, अब राजनीति ना, पारिवारिक इन्वेस्टमेंट बा। एगो इलाका में बहू टिकट पवले, ससुर जी मीडिया के कहलन, बहू बहुत कर्मठ बिया, घर सँभाल लेले, अब इलाका सँभाली।
जनता कहे लागल, घर में झाड़ू ठीक से चली कि विधानसभा में चलावल जाई। अब नेता के घर में पार्टी मीटिंग भी कौतुहल भरी हो गइल बा। सोफे पर ससुर जी, एक ओर बहू जी, बीच में समधी जी अउर दीवाल पर लटकल पार्टी झंडा, जे अब घर के पारिवारिक पहचान बन गइल बा।
भोजपुरी चैनल पर चल रहल बा हेडलाइन, समधन बनाम समधी, सियासी रण में रिश्तेदारी के रंग।
पति-पत्नी के बीच टिकट युद्ध, जनता भौंचक्क बा, परिवार मौज में। अब जनता के हाल पूछीए मत।
वो कहे लागल, भाई, अब चुनाव ना, घर संसार सेवा आयोग के इम्तिहान बा। मतदान केंद्र पर भी लोग कहे भाई, वोट त देब, बाकि जिताऊब तोहरा ससुराल वाला के। अब मतदाता बेचारा का करी, ऊ हाँ त करोड़न में टिकट बेचात बा। एगो नेताजी टिकट खातिर सब कुछ बर्बाद कइले के बाद सोशलमीडिया पर वायरल होके सड़क पर लोटत बानी। बिहार के राजनीति में अब विचारधारा ना, परिवारधारा बहे लागल बा। लोकतंत्र अब जनता से ना, घर के वोट बैंक से चल रहल बा। बाकि, ध्यान रखी, फोटो जूम कइके मत देखी, कहीं ससुर, बहू, समधी, समधन सब एकई प्रâेम में ना मिल जाय।

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