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संजय दत्त की ब्लॉकबस्टर फंस गई सीबीएफसी के जाल में, देरी ने बढ़ाया सस्पेंस

हिमांशु राज

बॉलीवुड के दिग्गज संजय दत्त की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘आखरी सवाल’ रिलीज से ठीक पहले संकट में फंस गई है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) की लंबी चुप्पी ने इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। स्क्रीनिंग के 72 घंटे पूरे हो चुके हैं, लेकिन बोर्ड की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। नियमों के अनुसार तीन कार्यदिवस में फैसला दिया जाना चाहिए, लेकिन अब चार दिन से ज्यादा समय बीत चुका है और स्थिति अब भी अस्पष्ट बनी हुई है।

फिल्म निर्माण का कारोबार समय पर काफी हद तक निर्भर करता है। प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए ऐसी देरी नुकसानदायक साबित होती है। थिएटर बुकिंग, मार्केटिंग कैंपेन और पूरी रिलीज रणनीति प्रभावित हो सकती है। ट्रेड एनालिस्ट राजेश ठाकुर कहते हैं, “आजकल रिलीज कैलेंडर काफी व्यस्त रहता है। कुछ दिनों की देरी प्रमोशनल मोमेंटम को तोड़ देती है और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में 20 से 30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। महीनों पहले योजना बनाई जाती है, ऐसे में यह अनिश्चितता भारी नुकसान पहुंचाती है।”

‘आखरी सवाल’ का विषय संवेदनशील बताया जा रहा है, जिसमें सामाजिक मुद्दों का गहरा चित्रण है। टीजर रिलीज के बाद फिल्म को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है और दर्शकों में उत्साह बना हुआ है। संजय दत्त का दमदार अंदाज और सस्पेंस से भरी कहानी ने अच्छा माहौल बनाया है, लेकिन सीबीएफसी की देरी ने इस उत्साह पर असर डाला है।

इंडस्ट्री में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या सेंसर बोर्ड वास्तव में स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है या उस पर किसी प्रकार का दबाव है। डिस्ट्रीब्यूशन कंसल्टेंट मीरा शर्मा का कहना है, “रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रभावित हो रही है। प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है, ताकि व्यापार और कला दोनों सुरक्षित रह सकें।” पिछले साल भी कई फिल्में इसी तरह की स्थिति में फंसी थीं, जैसे ‘उदयपुर जंक्शन’।

यह मामला एक बार फिर सीबीएफसी में सुधार की जरूरत को सामने लाता है। गहन जांच जरूरी है, लेकिन समयबद्ध फैसले भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब संबंधित संस्थाओं को देना होगा।

फिलहाल फिल्म की टीम चुप है और किसी आधिकारिक बयान का इंतजार किया जा रहा है। पूरी इंडस्ट्री की नजरें इस मामले पर टिकी हैं। आने वाले समय में यह मामला फिल्म जगत के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।

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