भरतकुमार सोलंकी
मुंबई
कभी कल्पना कीजिए- अगर पूरे देश में सालभर बस रिमझिम-रिमझिम बारिश होती रहे, दिन में हल्की ठंडक लिए, रात को मिट्टी की सोंधी महक फैलाती हुई – तो भारत कैसा लगेगा? न बाढ़ की तबाही, न सूखे की त्रासदी; बस हर ओर हरियाली, ताजगी और संतुलन का संगीत। यही वह आदर्श स्थिति है जिसकी चाह हर किसान, हर नागरिक और हर निवेशक के मन में है क्योंकि पर्यावरण में संतुलन ही असली समृद्धि का आधार है।
पर सवाल है – यह सपना कैसे साकार होगा?
दरअसल, आज की मूसलाधार बारिशें सिर्फ आसमान की गलती नहीं है, बल्कि इंसान की महत्वाकांक्षा का दुष्परिणाम है। जब हमने जंगल काटे, नदियां सुखार्इं, तालाब पाटे और खेतों में रसायनों का जहर घोला – तब धरती का प्राकृतिक चक्र टूट गया। नतीजा यह हुआ कि बादल या तो बरसते ही नहीं या फिर फटकर सब बहा ले जाते हैं। यह असंतुलन केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था का भी संकट बन गया है।
हकीकत यह है कि ‘रिमझिम वर्षा’ केवल बादलों से नहीं, बल्कि पेड़ों और मिट्टी से जन्म लेती है। वृक्ष धरती को ठंडक देते हैं, हवा को नमी देते हैं और बादलों को दिशा दिखाते हैं। हर पेड़ अपने आसपास एक सूक्ष्म बादल तैयार करता है। इसलिए अगर हर नागरिक हर साल पांच पेड़ लगाए और उनकी देखभाल करे, तो यह देश बादलों की प्रयोगशाला बन सकता है – जहां मूसलाधार नहीं, बल्कि संतुलित वर्षा होगी। यही ‘प्रकृति में निवेश’ का सबसे सशक्त तरीका है – जो हर व्यक्ति को ‘इकोनॉमिक रिटर्न’ के साथ ‘इकोलॉजिकल रिटर्न’ भी देता हैं। दीपावली सदियों से धन और फसल की समृद्धि का प्रतीक रही है, लेकिन सोचिए – जब नौकरीपेशा व्यक्ति हर महीने वेतन पाता है और मजदूर हर दिन मेहनताना, तो फिर दीपावली साल में सिर्फ एक बार क्यों? क्या यह संभव नहीं कि हम प्रकृति को संतुलित कर ‘हर दिन की दीपावली’ बना दें – जहां हर दिन की रिमझिम बरसात धरती को सींचे और हर रात की ठंडक जीवन को संतुलित करे? यह कल्पना कोई सपना नहीं, बल्कि एक निवेश की दिशा है। अगर सरकारें ‘बाढ़ नियंत्रण’ से आगे बढ़कर ‘संतुलित वर्षा नीति’ बनाएं, जिसमें वृक्षारोपण, तालाब पुनर्जीवन, वर्षाजल संचयन और शहरी हरियाली को विकास परियोजनाओं का हिस्सा बनाया जाए – तो यह न केवल पर्यावरणीय सुधार होगा, बल्कि आर्थिक क्रांति भी। जल ही जीवन है और जल का संतुलन ही भविष्य का सबसे बड़ा निवेश।
याद रखिए-
‘जहां पेड़ रहेंगे, वहां बादल ठहरेंगे;
जहां पानी सहेजा जाएगा, वहां जीवन मुस्कुराएगा।’
सच्ची दीपावली वही होगी – जब बारहों मास रिमझिम बरसे और हर खेत, हर दिल, हर आसमान मुस्कुराए। ‘सोच का निर्माण ही पहला कदम है क्योंकि जब इंसान की सोच बदलती है, तो पूरी कायनात उसके साथ कदम मिलाकर साथ निभाती है।’
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)
