नसरापुर उत्पीड़न और हत्या मामले में विशेष अदालत ने दरिंदे को मौत की सजा सुनाई है। अदालत ने २५ जून को ही उसे दोषी करार देकर अपना पैâसला सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को उसे फांसी की सजा सुनाई गई। भोर तालुका के नसरापुर में एक चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुए इस उत्पीड़न और उसके बाद की गई उसकी नृशंस हत्या से पूरा महाराष्ट्र दहल गया था। इस घटना के खिलाफ पूरे राज्य में भारी जनाक्रोश पैदा हो गया था। अब अदालत के इस फैसले से उस अभागिन मासूम और उसके माता-पिता को न्याय तो मिल गया है, लेकिन क्या इसके बाद यह कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र की महिलाएं और मासूम बच्चियां सुरक्षित हो गई हैं? अब सत्ताधारी दल इस बात का ढिंढोरा पीटेंगे कि कैसे उन्होंने नसरापुर मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया, महज ५८ दिनों के भीतर इसका निपटारा किया और उस दरिंदे को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाई। वे खुद ही अपनी पीठ थपथपाएंगे, लेकिन क्या इससे महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का ग्राफ कम होगा? यह एक बड़ा सवाल है। राज्य में इस समय सत्ताधारियों ने भ्रष्टाचार, घोटालों, पेपर लीक और राजनीतिक तोड़-फोड़ जैसी प्रवृत्तियों की बाढ़ ला दी है। महिलाओं और बच्चियों पर होने वाले अत्याचारों ने सारी हदें पार कर दी हैं। किसी जमाने में शिक्षा की नगरी माना जाने वाला पुणे आज महिला उत्पीड़न, दहेज प्रथा, `कोयता गैंग’, हत्याओं और गुंडागर्दी का केंद्र बन चुका है। मुख्यमंत्री के गृहनगर नागपुर में भी कानून-व्यवस्था के चीथड़े उड़ते दिखाई दे रहे हैं। पीड़ित महिलाओं की चीखें हर तरफ सुनाई दे रही हैं। जिन्हें `ईश्वर के घर के फूल’ कहा जाता है, वे मासूम बच्चियां इन दरिंदों की
हवस और क्रूरता
का शिकार हो रही हैं। हाल ही में भिवंडी तालुका के कशेली इलाके में एक सात साल की बच्ची का यौन उत्पीड़न किया गया। कोल्हापुर में चॉकलेट का लालच देकर चार साल की मासूम को हवस का शिकार बनाया गया। पिंपरी-चिंचवड़ में एक इमारत के सुरक्षा गार्ड ने सोसायटी की छोटी बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की। बदलापुर के एक नामी स्कूल में दो छोटी बच्चियों के साथ हुए यौन उत्पीड़न ने पूरे महाराष्ट्र में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया था। दो महीने पहले मुंबई के घाटकोपर में भी एक दरिंदे ने दो छोटी बच्चियों पर अत्याचार करने की कोशिश की थी। कल्याण के कोलशेवाड़ी में भी एक ५५ वर्षीय अपराधी ने एक नाबालिग लड़की का उत्पीड़न किया।
सरकार महिला उत्पीड़न के मामलों को लेकर पूरी तरह निष्क्रिय है और अपराधियों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। सिर्फ वोटों की खातिर `लाडली बहनों’ की दुहाई देने वाले इन हुक्मरानों ने माताओं और बहनों को सुरक्षा के मामले में भगवान भरोसे छोड़ दिया है। यही वजह है कि महाराष्ट्र में महिलाओं और मासूमों पर अत्याचार तथा उनकी हत्याओं की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यहां तक कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में सफर करना भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है। मामूली कहासुनी में कौन किसे चाकू घोंप दे, इसका कोई भरोसा नहीं है। उत्तर प्रदेश के बलात्कार मामले के आरोपी कुलदीप सेंगर का समर्थन करने वाले और महाविकास आघाड़ी सरकार द्वारा २०२० में मंजूर किए गए ‘महाराष्ट्र शक्ति फौजदारी कानून (संशोधन) विधेयक’ यानी `शक्ति कानून’ को केंद्र सरकार के पास पिछले छह सालों से लटकाकर रखने वाले
भाजपाइयों के दीये तले
महाराष्ट्र में ऐसा अंधेर फैला हुआ है। जो लोग चाल और चरित्र की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, जब उनका खुद का `चरित्र’ ऐसा हो, तो महाराष्ट्र की गरीब और लाचार महिलाएं वैâसे सुरक्षित रह सकती हैं? पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र के भीतर छोटे बच्चों और बच्चियों के उत्पीड़न तथा हत्या के २३ हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़ा तो सिर्फ दर्ज हुए अपराधों का है। अगर उन घटनाओं पर गौर करें जो दर्ज ही नहीं हो पातीं, तो यह साफ हो जाता है कि राज्य में `पॉक्सो’ या अन्य कड़े कानूनों का रत्तीभर भी खौफ नहीं बचा है। नसरापुर मामले में विशेष अदालत ने महज दो महीने के भीतर आरोपी को फांसी की सजा सुना दी। इससे एक अभागिन मासूम और उसके माता-पिता को न्याय जरूर मिला है, लेकिन महिला सुरक्षा के लिहाज से आज बेहद असुरक्षित बन चुके महाराष्ट्र का क्या? क्या यह राज्य पहले की तरह सुरक्षित हो पाएगा? क्या यहां की महिलाएं और बच्चियां अब चैन की सांस ले सकेंगी? क्या आज राज्य में कानून और व्यवस्था का कोई डर बचा है? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनके जवाब न्यायपालिका को नहीं, बल्कि राज्य सरकार को देने हैं; गृह मंत्रालय संभालने वाले मुख्यमंत्री को देने हैं। प्रगतिशील और सुरक्षित महाराष्ट्र को `बदलापुर से नसरापुर’ तक के अंधेरे रास्ते पर लाकर खड़ा करने वाले ये सत्ताधारी क्या ये जवाब दे पाएंगे? अगर वे ये जवाब दे पाते हैं, तभी सही मायनों में कहा जा सकेगा कि पीड़ित मासूम को न्याय मिला है और महिला सुरक्षा की दिशा में पहला कदम उठाया गया है। अन्यथा, सिर्फ एक मामले में फांसी हो जाने से क्या होगा; आगे क्या? यह सवाल ज्यों का त्यों बना रहेगा।
